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श्रेष्ठ कवि भी थे प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के नायक राजा लोने सिंह

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राजा लोने सिंह की हस्त लिखित पांडुलिपि - फोटो : LAKHIMPUR
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मितौली (लखीमपुर खीरी)। तराई क्षेत्र में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के नायक रहे मितौली के राजा लोने सिंह की प्रशासनिक कुशलता और शौर्य के बारे में तो लोग बहुत कुछ जानते हैं। लेकिन वह एक अच्छे कवि थे यह बहुत कम लोगों को पता है। राजा का हस्तलिखित काव्य ग्रंथ आज भी उनके पुरोहित परिवार के पास सुरक्षित है। भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति से ओतप्रोत काव्य ग्रंथ को साहित्य की अनमोल धरोहर माना जा रहा है।
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मितौली जो कभी मितौलगढ़ स्टेट के नाम से जाना जाता था। राजा लोने सिंह ने उन्नीसवीं सदी के मध्य में यहां शासन किया। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान उन्होंने अवध और तराई क्षेत्र में आजादी की लड़ाई का नेतृत्व किया। उन्होंने अपने शौर्य से इस क्षेत्र को करीब 33 महीने तक आजाद रखने में कामयाबी हासिल की। एक तरफ वह अंग्रेजों से लोहा ले रहे थे तो दूसरी तरफ भगोड़े अंग्रेज परिवारों को अपने यहां शरण देकर शरणागत की रक्षा करने की भारतीय परंपरा और धर्म का पालन भी किया। यह उनकी दयाशीलता का प्रमाण है।
राजा लोने सिंह अपनी प्रशासनिक व्यस्तताओं और अंग्रेजों के साथ से युद्ध के तनाव के बीच भी वह कविताएं लिखकर साहित्य सृजन में लगे रहे। उन्होंने श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध का काव्य रूपांतरण विविध छंदों में किया है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का बेहद मनोहारी चित्रण किया गया है। इस ग्रंथ की रचना संवत 1915 (सन 1858) में पूर्ण हुई। राजा लोने सिंह ने एक अन्य ग्रंथ अध्यात्म रामायण की भी रचना की है।
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उनका एक छंद देखिए
तालरी बाजत भूरि मृदंग, छूटहिं बहुरंग भयो नभ लालरी,
लालरी गुंजन की उरमान अमीर, भरयो भरि झोरिन शालरी,
शालरी होत बिलोके बिना बृजनंदन, आज रच्यो निज ख्यालरी,
ख्यालरी लोने कहा वरणै मनमोहन, नाचती दई करतालरी।
पं. विहारी लाल दीक्षित थे राजपुरोहित
राजा लोने सिंह का एक काव्य ग्रंथ की पांडुलिपि उनके पुरोहित परिवार के राम शंकर दीक्षित के पास सुरक्षित है। उनका कहना है उनके पूर्वज पं. विहारी लाल दीक्षित राजा लोने सिंह के राजपुरोहित थे। राजा लोने सिंह से यह ग्रंथ मिला था। इसके बाद यह विरासत पीढ़ी दर पीढ़ी पास रही। उन्होंने बताया कि एक बार उनके पिता चंदमौलि दीक्षित इस पुस्तक को लेकर लखनऊ के एक प्रकाशक के पास गए। प्रकाशक ने इस पांडुलिपि को पचास हजार रुपये में खरीदने की पेशकश की, लेकिन उन्होंने इस विरासत को बेचने से इनकार कर दिया।
अंग्रेजों से पराजित हुए तो अज्ञातवास में रहे, साहित्य साधन में लगे रहे
नवंबर 1858 में जब अंग्रेजों ने मितौलगढ़ पर चौतरफा हमला कर राजा लोने सिंह को पराजित कर दिया और उनके किले को तोपों से उड़ा दिया तो राजा किसी तरह बचकर निकले और अज्ञातवास में रहे। इस अज्ञातवास के दौरान भी साहित्य साधना में लगे रहे। राजा लोने सिंह कवि थे, यह बाद लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रो. त्रिलोकी नाथ दीक्षित के संपादन में नवल प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तक हिंदी साहित्यकारों के व्यक्तित्व और कृतित्व से सार्वजनिक हुई। इस पुस्तक के शिव सिंह सरोज नामक अध्याय में राजा लोने सिंह को कवि बताया गया। साथ ही उन्हें देश के सर्वश्रेष्ठ कवियों के समान ही सम्मान दिया गया।
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