लखीमपुर खीरी। थारू एंब्रॉयडरी की यूनीक कारीगरी अब थारू समाज की महिलाओं को नया मुकाम दिलाएगी। इस पेशे से जुड़े कारीगरों की आजीविका और आर्थिक स्थिरता में सुधार होगा। उनके हाथों के बने कढ़ाई के उत्पादों को इंटरनेशनल मंच भी मिलेगा। छह साल की कोशिश के बाद थारू एंब्रायडरी को जीआई टैग मिल गया है।
थारू एंब्रॉयडरी को जीआई टैग का दर्जा दिलाने के लिए शिल्पगाथा संस्था ने 18 जुलाई 2022 को आवेदन किया था। विकास आयुक्त हस्तशिल्प बरेली, नाबार्ड लखनऊ और राज्य सरकार के सहयोग से यह संभव हुआ है। थारू एंब्रॉयडरी राज्य की पहली जनजातीय क्राफ्ट है, जिससे जीआई टैग का गौरव प्राप्त हुआ है।
संस्था कई वर्षों से जनजातीय हस्तशिल्प कारीगरों के साथ थारू एंब्रॉयडरी, मूंज तथा जलकुंभी क्राफ्ट पर कार्य कर रही है। थारू एंब्रॉयडरी एक सांस्कृतिक धरोहर है। शिल्पगाथा की डायरेक्टर मोहिनी चौहान, वंदना राठौर का कहना है यह बड़ी उपलब्धि है। इससे थारू समाज की महिलाओं के उत्थान को बढ़ावा मिलेगा।
पलियाकला क्षेत्र के परसिया गांव की कुमारी उर्मिला ने बताया कि उनके यहां 50 महिलाएं इससे जुड़ी हैं। लहंगा, मेजपोश, बॉर्डर पर कढ़ाई समेत अन्य प्रोडक्ट बनाते हैं। जीआई टैग मिलने से आर्थिक सुधार होगा। अभी कच्चा माल सीतापुर, पलिया से खरीदते हैं। अब अपने उत्पाद को कहीं भी बेच सकेंगे।
क्या है जीआई टैग
जीआई टैग एक संकेतक है। जिससे भौगोलिक क्षेत्र की विशेषता वाले उत्पादों को पहचान मिलती है। जीआई का पंजीयन दस वर्ष की अवधि के लिए वैध रहता है। एक बार जीआई टैग का दर्जा मिलने पर कोई अन्य निर्माता उत्पादों के विपणन के लिए इसके नाम का दुरुपयोग नहीं कर सकता है। ग्राहकों को उत्पाद की प्रामाणिकता के प्रति आश्वस्त भी करता है। इससे उत्पाद की ब्रांडिंग, मार्केटिंग, निर्यात समेत कानूनी संरक्षण मिलता है।