लखीमपुर खीरी। शहर से गांवों तक चश्मे की दुकानों की भरमार है। यहां ऑप्टोमेट्रिस्ट की डिग्री-डिप्लोमा लिए बिना ही अप्रशिक्षित दुकानदार आंखों की जांच कर चश्मा बना रहे हैं। चिकित्सकों का कहना है कि अप्रशिक्षित लोगों से चश्मा बनवाने से आंखों की रोशनी पर फर्क पड़ रहा है।
जिले में चश्मे की दुकानें लगातार खुल रहीं हैं। शहर के अस्पताल रोड, थरवनगंज, मेन रोड सहित कई गांवों की गलियों तक चश्मे की दुकानों की भरमार है। इनमें कुछ दुकानों पर तो जांच करने वाले ऑप्टोमेट्रिस्ट का डिप्लोमा किए हुए हैं, लेकिन अधिकांश दुकानों पर बिना डिग्री व प्रशिक्षण के दुकानदार आंखों की जांच का बेहतर दावा करते हुए मरीजों की आंखों के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं।
अप्रशिक्षित होने के कारण यह दुकानदार आंखों की सही से जांच नहीं कर पाते हैं। इससे लोगों की आंखों में कई बुरे प्रभाव पड़ रहे हैं। चिकित्सकों का कहना है ऐसे दुकानदारों से चश्मा बनवाने से मरीजों की दिक्कतें और बढ़ जाती हैं। इसके बाद चिकित्सकों के पास दौड़ लगाते हैं।
यह होता है आंखों काे नुकसान
- बार-बार चश्मा बदलवाने से आर्थिक व मानसिक प्रभाव पड़ता है।
- सस्ते चश्मे से आंखों में तनाव और संक्रमण का खतरा रहता है।
- गलत जांच से आंखों की रोशनी पर असर पड़ता है।
- अप्रशिक्षित आंखों की गंभीर समस्या नहीं पकड़ पाते।
छह मीटर की दूरी, बहुत जरूरी
नेत्र रोग विशेषज्ञों के मुताबिक, आंखों की जांच के लिए विजन ड्रम से छह मीटर की दूरी जरूरी होती है, लेकिन कई दुकानों में जगह कम होने के कारण छह मीटर की दूरी का नियम भी नहीं चल रहा है। इससे उनकी जांच सही से नहीं हो पाती है और उन्हें गलत नंबर का चश्मा दे दिया जाता है। इससे मरीजों को फायदे की जगह नुकसान होता है।
अप्रशिक्षित चश्मे के दुकानदार आंख के मरीजों को स्टेरॉयड दे देते हैं। लंबे समय तक इसके उपयोग से आंखों की पुतली पर असर पड़ता है। इसके अलावा आंखों में घाव हो जाता है। आंखों में घाव की समस्या को लेकर कई मरीज जिला अस्पताल भी आते हैं। वहीं अगर जांच सही नहीं हुई और गलत नंबर या अच्छी गुणवत्ता का चश्मा नहीं है तो वह भी आंखों के लिए खतरनाक है। - डॉ. पूनम वर्मा, नेत्र रोग विशेषज्ञ, जिला अस्पताल