पलियाकलां। शारदा नदी का जलस्तर खतरे के निशान से 79 सेंटीमीटर ऊपर पहुंच गया है। सुबह आठ बजे शारदा 154.890 सेंटीमीटर पर बह रही थी। वहीं दोपहर बाद नदी का जलस्तर खतरे के निशान को एक मीटर पार कर गया।
नदी का पानी पलिया शहर की सीमा पर चीनी मिल के सामने रोड क्रास करने लगा है। नगला रोड पर नदी का पानी बह रहा है, जबकि शारदा नदी पार करते हुए भीरा रोड पर मोड़ के पास करीब दो फिट तक रोड पर पानी क्रास कर रहा है। बावजूद इसके लोग जान जोखिम में डालकर आवाजाही कर रहे हैं। प्रशासन की तरफ से एसडीएम डॉ. अमरेश कुमार, तहसीलदार आशीष कुमार सिंह भी दलबल के साथ लगे हुए हैं और बाढ़ प्रभावित गांवों को खाली कराने के निर्देश दे रहे हैं। श्रीनगर गांव की ओर भी नदी काफी तेजी से बढ़ रही है। जिसके कारण शारदा नदी किनारे बनाए गए क्रास पिलर भी नदी में डूब गए हैं। उधर, श्रीनगर गांव में मंगलवार को भी लेखपाल अरविंद कुमार व ग्राम प्रधान द्वारा डुग्गी पिटवाकर लोगों को सतर्क रहने के निर्देश दिए हैं।
मझगईं। तीन दिनों से हो रही बारिश से जहां सैकड़ों बीघा गन्ने की फसल गिर गई, वहीं शारदा नदी की बाढ़ ने इलाके के कई गांवों में दस्तक दे दी है। नदी किनारे सटे खालेपुरवा, नयापुरवा, चौरी, बबौरा, पंछी फार्म, दुबहा, कुंवरपुर कलां, विष्णुपुर आदि गांवों के आसपास बाढ़ के पानी ने दस्तक दे दी है। जिससे ग्रामीणों की दिलों की धड़कनें बढ़ी हुई हैं।
आजाद नगर गांव हुआ खाली,
- नाव से बाहर आए हैं ग्रामीण, मवेशियों को भी लाए साथ
संवाद न्यूज एजेंसी
पलियाकलां। हर साल बाढ़ की विभिषिका सर्वाधिक आजादनगर के बाशिंदे झेलते हैं। यहां प्रत्येक वर्ष आने वाली बाढ़ के चलते पूरे गांव को खाली करा दिया जाता है। जिसके चलते यहां के ग्रामीण या तो ऊंचे स्थानों पर शरण लेते हैं या फिर श्रीनगर गांव स्थित अपने दूसरे मकानों में आकर रहते हैं। ग्रामीणों ने बताया कि उनका आवागमन गांव में केवल नाव से होता है। पूरा गांव खाली हो जाता है और जरूरत का सामान वह लोग नाव से बाहर लाते हैं। मवेशियों को भी नाव व अन्य साधनों से गांव से बाहर करते हैं।
क्या कहते हैं आजादनगर के ग्रामीण
आजादनगर गांव के सीताराम ने बताया कि शारदा नदी का जलस्तर जब बढ़ने लगता है तो गांव किनारे ही नदी हिलोरे मारने लगती है जिसके बाद प्रशासनिक संकेत भी मिल जाते हैं। जिसपर ग्रामीण गांव को खाली करते हैं। प्रत्येक वर्ष उनको एक बार गांव खाली करना पड़ता है जिससे काफी दिक्कतें आती हैं।
गांव के श्रीकृष्ण ने बताया कि नदी किनारे सटा गांव होने के कारण हर साल गांव खाली करते हैं। पक्के मकान नहीं बनाते हैं। झोपड़ीनुमा घर बनाकर ही काम चलाते हैं और बाढ़ आने के समय उसको खाली कर देते हैं। बाढ़ का पानी उतरने के बाद फिर उन्हीं झोपड़ियों को बेहतर करके उसमें गुजारा करने लगते हैं।
आजादनगर के सीताराम साहनी ने कहा कि हर साल वह अपने हाथों से झोपड़ीनुमा आशियाना बनाते हैं और उसको बाढ़ के मंझधार में छोड़कर ऊंचे स्थानों की शरण लेते हैं। बाढ़ का पानी उतरने के बाद हालात सामान्य होने पर ही लौटते हैं। कई-कई बार झोपड़ी भी बाढ़ के पानी में बह जाती है, जिसको दोबारा से बनाकर गुजारा करते हैं।
गांव के दुलारे ने कहा कि बाढ़ से सबसे ज्यादा प्रभावित उनका गांव आजादनगर है। यहां बाढ़ आने के समय मवेशियों को कड़ी मशक्कत करके गांव से बाहर लाते हैं। अगर बाढ़ आने के बाद कुछ सामान की जरूरत पड़ती है तो ऊंचे स्थानों पर रखे सामान को लाने के लिए नाव का सहारा लेते हैं। हर साल बाढ़ के समय यहीं हालातों से दोचार होना पड़ता है।