नयापुरवा में कटान शुरू, ग्रामीणों में हड़कंप, इलाके में हुई रिकार्ड वर्षा
रिकार्ड वर्षा होने के बाद शारदा नदी का जलस्तर हालांकि धीरे-धीरे नीचे आना शुरू हो गया है लेकिन वनबसा बैराज से लगातार रिलीज किए जा रहे पानी तथा हो रही बरसात से ग्रामीणों के माथे पर अब भी शिकन है। उधर इलाके के नयापुरवा गांव में तो शारदा नदी ने आबादी की तरफ अपना रुख कर लिया है। भूमि कटान शुरू करते हुए नदी ग्रामीणों के आशियानों की तरफ बढ़ने लगी है। इससे उनमें हड़कंप मचा हुआ है। ग्रामीणों के अनुसार नयापुरवा में हर साल बाढ़ का प्रकोप होता है तथा यहां पर आवागमन का एकमात्र सहारा नाव ही शेष बचती है।
इलाके में बीते दो दिनों से हो रही लगातार बरसात के कारण शारदा नदी का जलस्तर ऊपर-नीचे खिसक रहा है। इसमें पिछले 24 घंटों में केन्द्रीय जल आयोग के अनुसार रिकार्ड 58 एमएम वर्षा हुई है। इससे शारदा का जलस्तर खतरे के निशान 153.620 सेमी से 39 सेमी ऊपर 154.010 सेमी पर स्थिर है। हालांकि सुबह 11 बजे तक नदी का जलस्तर बढ़ा हुआ था लेकिन उसके बाद नदी का रुख धीमा हो गया। जिससे नदी स्थिर हो गई है। केन्द्रीय जल आयोग के स्थानीय कार्यालय के अनुसार धीमी गति से लगातार वनबसा बैराज से पानी रिलीज किया जा रहा है। उधर बाढ़ का अंदेशा देखते हुए इलाके के निचले नयापुरवा, खालेपुरवा, चौरी, आजादनगर, बर्बादनगर, मेलाघाट, श्रीनगर आदि गांवों के ग्रामीणों में हड़कंप मच गया है। नयापुरवा के हालात इसमें सबसे अलग हैं। यहां का अधिकतर हिस्सा बाढ़ के समय बुरी तरह से घिरा रहता है तथा यहां एकमात्र साधन नाव ही रहता है जिससे ग्रामीण आवागमन करते हैं। नयापुरवा के ग्रामीणों से वार्ता करने पर उन्होंने अपना दर्द कुछ इस तरह से बयां किया।
गांव के शिशुपाल का कहना है कि शारदा नदी हर बार उनके गांव में घुसकर तबाही मचाती है जिससे वह लोग ऊंचे स्थान पर शरण लेते हैं। यहीं के रामप्रसाद बताते हैं कि यहां बीते लगभग पांच सालों से शारदा तबाही मचाती चली आ रही है जिससे वह लोग चैन से रह नहीं पाते हैं। अजय कश्यप ने बताया कि हर साल बाढ़ के समय यहां तीन से चार फिट तक पानी चलता है तथा लोगों के पास आवागमन के लिए केवल नाव की सहारा होता है। बताया कि यहां हर साल कई लोग बेघर होते हैं। शारदा प्रसाद भगत कहते हैं कि बाढ़ आने के समय सभी एकजुट हो जाते हैं तथा एक दूसरे की मदद भी करते हैं। जिससेे उनको ज्यादा परेशानियां नहीं होती हैं। अखिलेश कुमार ने बताया कि बाढ़ के समय यहां सरकारी इमदाद बहुत कम मिलती है तथा प्रशासन तथा जनप्रतिनिधि यहां नाव से आना उचित नहीं समझते हैं जिससे वह लोग नारकीय जीवन जीते हैं। शत्रोहन लाल ने बताया कि कई ग्रामीण ऐसे हैं जो काफी अमीर थे लेकिन बाढ़ ने उनका सबकुछ छीनकर उनको खानाबदोशों का जीवन जीने पर मजबूर कर दिया है। नेकीराम ने बताया कि उनका एक पक्का मकान था जो शारदा नदी की बाढ़ में कट गया था लेकिन सरकारी इमदाद के नाम पर उनको मात्र चार हजार रुपये की सहायता मिली थी। अब बताइए चार हजार रुपये में पक्का मकान बनाया जा सकता है क्या। इसी तरह अन्य ग्रामीण भी बाढ़ की विभाषिका से तो परेशान हैं ही साथ ही शासन-प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा का शिकार हैं।