पं. रामदेव मिश्र शास्त्री। संवाद।
बांकेगंज। पितृपक्ष के दौरान श्राद्ध केवल परंपरा भर नहीं, बल्कि श्रद्धा और मनोविज्ञान का अद्भुत संगम है। यह हमें अहसास कराता है कि हम अकेले नहीं हैं। हमारे पूर्वज लगातार हमें आशीर्वाद देते रहते हैं।
गोला गोकर्णनाथ के ज्योतिषाचार्य के मुताबिक, इस बार पितृपक्ष सात से शुरू होकर 21 सितंबर तक रहेंगे। खास बात यह है कि आरंभिक दिन रविवार को चंद्रग्रहण के साथ पड़ रहा है, जिसे ज्योतिषीय दृष्टि से विशेष माना गया है। पितृपक्ष में प्रत्येक दिन का महत्व अलग होता है। उसी के अनुसार तिथि विशेष पर श्राद्ध कर्म किए जाते हैं। इस दौरान परिवारीजन अपने पितरों को तर्पण, पिंडदान और ब्राह्मण भोजन कराकर स्मरण करते हैं।
पितृपक्ष में किए गए श्राद्ध से पूर्वज प्रसन्न होकर आशीर्वाद देते हैं। शास्त्री ने बताया कि मनुस्मृति और पुराणों के अनुसार श्राद्ध से वंश में सुख-समृद्धि आती है। पिंडदान और तर्पण से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है।
स्वास्थ्य से भी जुड़ा है विज्ञान
पितृ पक्ष के दौरान सादा व सात्विक भोजन करने की परंपरा है। यह शरीर के लिए प्राकृतिक डिटॉक्स का काम करता है। सीएचसी अधीक्षक डॉ. एके सिंह बताते हैं कि ऋतु परिवर्तन के समय हल्का और पचने योग्य भोजन स्वास्थ्य के लिए अमृत समान है। यह संक्रमण से बचाव करने और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में सहायक होता है। सात्विक भोजन से मनुष्य के शरीर को संबल मिलता है।