लखीमपुर खीरी। पंचायत चुनाव नजदीक आते ही प्रत्याशियों की सबसे बड़ी चिंता स्थानीय मुद्दे नहीं, बल्कि परदेस में रह रहे अपने गांव के वोटर होते हैं। चुनाव आते ही इन मतदाताओं की तलाश शुरू हो जाती है कि कौन सा मतदाता किस शहर में है। कितने लोग एक साथ हैं और कब गांव पहुंच पाएंगे। इसके लिए उम्मीदवारों की ओर से बाकायदा टीम तैयार की जाती है, जो फोन और सोशल मीडिया के जरिये संपर्क साधकर मतदाताओं की सूची तैयार करती है।
ग्रामीण क्षेत्रों में आमतौर पर बड़ी संख्या में लोग दिल्ली, मुंबई, पंजाब, गुजरात, राजस्थान और दक्षिण भारत के राज्यों में नौकरी करते हैं। ऐसे में मतदान के समय इन्हें बुलाने के लिए प्रत्याशी हर तरह की पेशकश करते दिखाई देते हैं कि कितने वोटर हैं, बताइए तो सही, खर्च हम देंगे।
कई दावेदार परदेसियों की आवाजाही के लिए ट्रेन टिकट से लेकर प्राइवेट बस तक की बुकिंग कर देते हैं। कुछ जगहों पर समूह बनाकर वैन और टैक्सियों से मतदाताओं को गांव तक पहुंचाया जाता है।
गांव में चर्चा रहती है कि किस प्रत्याशी ने कितने लोगों को बुलाया। कई मतदाता भी चुनावी माहौल, रिश्तेदारी और गांव के सामाजिक दबाव के कारण घर लौट आते हैं। प्रत्याशी भी मानते हैं कि बाहर रहने वाले वोटर चुनाव परिणाम पर सीधा प्रभाव डालते हैं, इसलिए उनकी हिस्सेदारी बेहद महत्वपूर्ण है।
परदेस में रह रहे इन्हीं मतदाताओं को वापस लाने की कवायद में पंचायत चुनाव की असली हलचल दिखती है। चुनावी दौर में गांव-गांव से उठने वाली यह आवाज कितने वोटर हैं, बताइए अब जीत-हार का बड़ा पैमाना बन चुकी है।