रामवाटिका में चल रही शतचंडी महायज्ञ और रासलीला
तुलसीदास की कर्मस्थली रामवाटिका में आयोजित शतचंडी महायज्ञ में समाज कल्याण के लिए 44,000 आहुतियां डाली गईं। रामवाटिका का पूरा वातावरण भक्ति रस से सराबोर रहा। रामलीला में बाणासुर संवाद, परशुराम संवाद और राम-सीता विवाह का मंचन किया गया। वृंदावन से आई दिव्य लीला मंडल के स्वामी भूदेव शर्मा और स्वामी शिव कुमार शर्मा के निर्देशन में रासविहार, मयूर नृत्य के साथ द्रोपदी चीर हरण और पांडवों के राजसूय यज्ञ का सजीव मंचन किया गया।
मां दुर्गा दरबार की मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा वैदिक मंत्रोच्चार के साथ की गई। पहली आरती बस आपरेटर यूनियन के जिलाध्यक्ष मोहन बाजपेई ने की। रासलीला में राजसूय यज्ञ में पांडवों ने सभी राजाओं को निमंत्रण दिया। सभी राजाओं के आने पर बैठक के दौरान प्रशभन किया गया कि प्रथम तिलक किसका होना चाहिए। शिशुपाल को छोड़ कर सभी राजाओं ने प्रथम तिलक के लिए श्रीकृष्ण के नाम पर सभी राजाओं ने अपनी सहमति प्रदान कर दी। शिशुपाल ने श्रीकृष्ण को गालियां देने लगा। सौ गालियां श्रीकृष्ण सुनते रहे। सौ गालियां सुनने के बाद श्रीकृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्रसे शिशुपाल का सिर काट दिया।
भीम अपने चचेरे भाई दुर्योधन को अपना महल दिखाने के लिए ले जाते हैं। महल में प्रवेश करते ही दुर्योधन शीशा समझ कर पानी में गिर जाता है। द्रोपदी दुर्योधन को देख कर हंस देती। दुर्योधन इस अपमान का बदला लेने के लिए पांडवों को द्यूत क्रीडा के लिए आमंत्रित करता है। अपने मामा शकुनि के साथ छल करके पांडवों का राजपाट यहां तक कि द्रोपदी को भी हार जाते हैं।
दुर्योधन द्रोपदी का चीर हरण करवाता है। श्रीकृष्ण द्रोपदी की लाज बचाते है। इस अवसर पर भगवती प्रसाद अग्रवाल, रामकुमार शर्मा, समलिया प्रसाद मिश्रा, व्यापार मंडल अध्यक्ष सुदीप निगम, अवधेश मिश्रा, रमाकांत अवस्थी समेत हजारों दर्शक मौजूद रहे।