लखीमपुर खीरी। देश के बायोप्लास्टिक उद्योग के नक्शे पर लखीमपुर खीरी का नाम दर्ज होने जा रहा है। कुंभी में 3080 करोड़ रुपये की लागत से देश का पहला इंटीग्रेटेड बायोप्लास्टिक प्लांट तैयार हो रहा है। इसका निर्माण अंतिम चरण में है और मशीनरी स्थापित करने का काम तेजी से चल रहा है। दिवाली से पहले अक्तूबर में यहां उत्पादन शुरू होने की उम्मीद है।
बलरामपुर चीनी मिल्स लिमिटेड की ओर से स्थापित किए जा रहे इस प्लांट की आधारशिला मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने फरवरी, 2025 में रखी थी। करीब 135 एकड़ भूमि में विकसित हो रहे प्लांट का सिविल कार्य पूरा हो चुका है। परियोजना की शुरुआती उत्पादन क्षमता करीब 80 हजार टन प्रतिवर्ष होगी।
परियोजना शुरू होने से जिले को नई औद्योगिक पहचान मिलने के साथ स्थानीय युवाओं के लिए प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर खुलेंगे। किसानों को भी कृषि अवशेषों से अतिरिक्त आमदनी का अवसर मिलेगा।
कुंभी चीनी मिल इकाई प्रमुख डॉ. सुनील कुमार यादव के अनुसार, परियोजना केवल बायोप्लास्टिक उत्पादन तक सीमित नहीं होगी। इसके आसपास बड़ा औद्योगिक हब भी विकसित किया जाएगा। सरकार की ओर से लगभग 200 एकड़ भूमि का अधिग्रहण कर विभिन्न छोटी औद्योगिक इकाइयां स्थापित करने की योजना है। इन इकाइयों में बायोप्लास्टिक से खिलौने, पानी की बोतलें, गिलास, पेन, कप-प्लेट, ट्रे, थैले, बोरी, मोजे और कपड़ों सहित दैनिक उपयोग के उत्पाद तैयार किए जाएंगे।
डॉ. सुनील के अनुसार, प्लांट में बायोप्लास्टिक तैयार करने के लिए धान की पराली, गन्ने की पत्तियां और दूसरे कृषि अवशेषों का भी इस्तेमाल किया जाएगा। इन अवशेषों की किसानों से खरीद की जाएगी। इससे किसानों को फसल के साथ अतिरिक्त आय मिलेगी और खेतों में पराली व गन्ने की पत्तियां जलाने की समस्या पर भी रोक लगेगी।
बायोप्लास्टिक प्लांट के यूनिट हेड ललित जैन ने बताया कि मशीनें लगाने का काम करीब 90 प्रतिशत पूरा हो चुका है। दो सेक्शन कंप्लीट हो गए हैं। सितंबर में मैकेनिकल के साथ इलेक्ट्रिकल कार्य भी पूरा कर लिया जाएगा। इसके बाद अक्तूबर से प्लांट संचालन की तैयारी है। संवाद
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चीनी से बनेगा बायोप्लास्टिक
कुंभी के बायोप्लास्टिक प्लांट में गन्ने से प्राप्त चीनी को कच्चे माल के तौर पर इस्तेमाल कर पॉली लैक्टिक एसिड (पीएलए) तैयार किया जाएगा। सबसे पहले चीनी के घोल का सूक्ष्मजीवों की मदद से किण्वन कराया जाएगा, जिससे लैक्टिक एसिड बनेगा। इसके बाद लैक्टिक एसिड को शुद्ध कर लैक्टाइड बनाया जाएगा। अगले चरण में लैक्टाइड के अणुओं को जोड़ने की प्रक्रिया यानी पॉलीमराइजेशन के जरिये पीएलए तैयार होगा। इसे दानों (ग्रेन्यूल्स) के रूप में तैयार किया जाएगा। इन्हीं दानों से विभिन्न कंपनियां कप, ट्रे, पैकेजिंग सामग्री, बोतल, स्ट्रॉ और अन्य उत्पाद तैयार कर सकेंगी। पूरी प्रक्रिया में पेट्रोलियम आधारित कच्चे माल की जगह गन्ने से प्राप्त चीनी का इस्तेमाल होगा। यही वजह है कि इसे बायो-बेस्ड प्लास्टिक कहा जाता है।
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200 एकड़ में विकसित होगा औद्योगिक हब
बायोप्लास्टिक प्लांट के साथ ही प्रदेश सरकार करीब 200 एकड़ भूमि में औद्योगिक हब विकसित करने की कवायद कर रही है। इस क्षेत्र में बायोप्लास्टिक आधारित उत्पाद बनाने वाली छोटी-बड़ी इकाइयां स्थापित की जाएंगी। यहां पानी की बोतल, गिलास, कप-प्लेट, ट्रे, पेन, खिलौने, थैले, बोरी, कपड़े, मोजे सहित दैनिक उपयोग की कई वस्तुओं का निर्माण किया जा सकेगा। इसके लिए भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया चल रही है। परियोजना में 483 किसान प्रभावित हो रहे हैं। एसडीएम गोला युगांतर त्रिपाठी ने बताया कि इस परियोजना का बजट करीब 83 करोड़ रुपये है।
कुंभी में स्थापित हो रहा बायोप्लास्टिक प्लांट जिले के लिए ऐतिहासिक औद्योगिक उपलब्धि है। गन्ने जैसी स्थानीय कृषि उपज से बायोप्लास्टिक जैसे उच्च मूल्य के उत्पाद तैयार करने वाली यह परियोजना कृषि और उद्योग के बीच नए तालमेल की मिसाल बनेगी।
-अंजनी कुमार सिंह, डीएम
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