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देवकली में राजा जन्मेजय ने किया था नाग यज्ञ 

Thu, 27 Jul 2017 11:08 PM IST
अशोक निगम लखीमपुर खीरी।
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नाग यज्ञ स्थली - फोटो : अमर उजाला
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नागपंचमी पर विशेष
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कालसर्प योग निदान के लिए यहां होती है तंत्र साधना 
नाग पूजा को यहां दूर-दूर से आते हैं श्रद्धालु
 शहर से पश्चिम नौ किलोमीटर दूर स्थित पौराणिक स्थल देवकली महाभारत कालीन राजा जन्मेजय की नाग यज्ञ स्थली के रूप में जाना जाता है। जनश्रुति है कि राजा जन्मेजय ने अपने पिता राजा परीक्षित की नाग के डंसने से हुई मौत का बदला लेने के लिए यहीं पर सर्प यज्ञ किया था। यहां मौजूद सर्पकुंड और कुंड की गहराई में मिलने वाली हवन की भस्म और अवशेष इस जनश्रुति की पुष्टि करती है। यहां ऊंचे टीलों में सांपों की सैकड़ों बांबियां हैं जिनमें विभिन्न प्रजातियों के सांप रहते हैं।  
कभी देवस्थली के नाम से प्रसिद्ध इस स्थान का नाम बिगड़ते-बिगड़ते देवकली हो गया। नाग पूजा और काल सर्प योग निवारण के लिए तंत्र साधना का यह प्रमुख केंद्र हैं। जनश्रुति यह भी है कि कलयुग के प्रारंभ में यहां राजा देवक हुए। उनकी पुत्री देवकली ने यहीं तपस्या की थी। उन्हीं के नाम पर इस स्थान का नाम देवकली पड़ा। राजा देवक ने ही यहां पर देवेश्वर शिव मंदिर की स्थापना की थी। मंदिर परिसर में एक खंडित शिवलिंग स्थापित हैं। बताते हैं कि मुगलों ने इसे खंडित करने का प्रयास किया लेकिन वह इसे पूरी तरह तोड़ नहीं पाए।
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सूर्य उपासना का प्रमुख केंद्र रही है देवकली
देवकली सूर्य उपासना का प्रमुख केंद्र रही है। देवेश्वरनाथ शिव मंदिर के ठीक सामने 70 मीटर लंबा और 60 मीटर चौड़ा एक मनोरम तीर्थ हैं जिसमें उत्तर की ओर पक्की सीढ़ियां बनी हुई हैं। महिलाओं के स्नान के लिए स्नानघाट बना हुआ है। यह तीर्थ सूर्यकुंड के नाम से प्रसिद्ध है। सूर्यकुंड होने से यह प्रमाणित होता है कि यह स्थान सूर्य उपासना का प्रमुख केंद्र रहा होगा। 
 
पुराणों में भी उल्लेख है देवकली का
देवकली का देवस्थली के रूप में पारासर पुराण के तीर्थ महात्म्य में उल्लेख मिलता है। देवकली आश्रम के संत भवानी प्रसाद उपाध्याय उर्फ नेपाली बाबा कहते हैं कि इस स्थान की प्राचीनता असंदिग्ध है। वह इस स्थान की खोज करते हुए यहां पहुंचे। उन्होंने सर्पकुंड की खुदाई कराई तो पांच फिट की गहराई के बाद राख मिश्रित काली मिट्टी मिली। इसी जगह पर अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल का एक सिक्का भी प्राप्त हुआ है। 
 
गुप्तकाल में यहां समृद्ध बस्ती होने का अनुमान
देवकली मंदिर तीर्थ और आसपास क्षेत्र ऊंचे-ऊंचे टीलों से भरा है। यहां खुदाई के दौरान पत्थर की दर्जनों प्राचीन मूर्तियां मिली हैं। युवराजदत्त महाविद्यालय इतिहास विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. माणिक लाल गुप्ता का कहना है कि खुदाई में मिली इन मूर्तियों की निर्माण शैली गुप्तकालीन है। इससे यह साबित होता है कि यहां गुप्तकाल में समृद्ध और विकसित बस्ती रही होगी।  
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आज यहां लगेगा सपेरों का मेला, जुटेगी भीड़
नागपंचमी के मौके पर देवकली में सपेरों का मेला लगेगा और श्रद्धालुओं की भीड़ जुटेगी। संत भवानी प्रसाद उपाध्याय उर्फ नेपाली बाबा के निर्देशन में कालसर्प योग शांति महायज्ञ का आयोजन किया जाएगा। नेपाली बाबा ने यहां चंद्रकला आश्रम की स्थापना के साथ द्वादश ज्योर्तिलिंग की भी स्थापना की है।  
 
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