लखीमपुर खीरी। अमर उजाला फाउंडेशन के ‘हिंदी हैं हम’ अभियान के तहत रविवार को ‘तकनीकी युग में हिंदी के विकास की संभावनाएं’ विषय पर एक आॉनलाइन संगोष्ठी का आयोजन हुआ। इसमें वक्ताओं ने विश्वस्तर पर हिंदी की बढ़ती मान्यता को देखते हुए इसे राष्ट्रभाषा बनाए जाने की मांग रखी। उन्होंने कहा कि विदेशों में भी हिंदी सीखने और उसे अपनाने की होड़ है। यह सब तकनीक के जरिये ही संभव हुआ है।
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हिंदी को वैश्विक मंच पर लाने में तकनीक का बड़ा योगदान है। दुनिया में हिंदी साहित्य अनुवादित होकर समकालीन हो रहा है। जन भाषा होने के कारण हिंदी आज मीडिया और सिनेमा की भाषा बन चुकी है, जिससे यह समृद्ध हुई है। यूरोप और अमेरिकी आंग्ल भाषा की तुलना करें तो यूरोप भाषा के व्याकरण के दबाव से मुक्त नहीं हो सका। लिहाजा अमेरिकी अंग्रेजी आज बाजार की भाषा बन गई है। इसी तरह हिंदी को और समृद्ध बनाने के लिए हमें व्याकरण के पारंपरिक दबाव से मुक्त करना पड़ेगा, जिससे इसकी ग्राह्यता और बढ़े। हिंदी कोडिंग की भाषा बनेगी, तभी सशक्त और वैश्विक पटल पर समृद्ध हो सकेगी।
-डॉ. निरुपमा अशोक, अवकाश प्राप्त प्राचार्य, भगवानदीन आर्य कन्या डिग्री कॉलेज, लखीमपुर
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हिंदी का आधार संस्कृत है, लिहाजा हिंदी पूरी तरह से वैज्ञानिक भाषा है। हमारी भाषा में जो लिखा जाता है, वही उच्चारित होता है। हिंदी को तकनीक ने बड़ा आयाम दिया है, जिससे वह वैश्विक भाषा बनने की ओर अग्रसर है। कनाडा, रुस, नार्वे और मॉरीशस मे बाकायदा हिंदी से जुड़ी तमाम संस्थाएं चल रहीं हैं।
- डॉ. सुरचना त्रिवेदी, प्राचार्य, भगवानदीन आर्य कन्या डिग्री कॉलेज, लखीमपुर खीरी
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देश में सबसे ज्यादा बोलने, पढ़ने व समझने के बावजूद हिंदी देश में अभी राजभाषा ही है। हिंदी ने चाय, लीची, रिक्शा, वकील, नवाब, कैंची, कैदी, बेगम आदि दूसरे देशों को आत्मसात किया है, जो अकेली हिंदी की ताकत है। ऐसा कभी नहीं लगता कि यह शब्द हमारे नहीं हैं। हिंदी की इस महानता पर हमें गर्व है और हमारे देश की राष्ट्रभाषा हिंदी ही होनी चाहिए।
-डॉ. देशराज वर्मा, सहायक प्रोफेसर, हिंदी, युवराज दत्त महाविद्यालय, लखीमपुर खीरी
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जब लोग बहुत ज्यादा भावुक होते हैं तो अक्सर वे अंग्रेजी या अपनी क्षेत्रीय भाषा का इस्तेमाल करते हैं, जिसका कारण उनका उस भाषा से सहज भावनात्मक जुड़ाव है। हिंदी के लिये बेहतर है कि हम हिंदी को अपनी भावनाओं से सीचें। हिंदी में सोचें, लिखें और पढ़ें। तकनीकी युग में हिंदी के विकास की अनंत संभावनाए हैं।
- शिवा अवस्थी, शोधार्थी व
कवयित्री, लखीमपुर खीरी
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स्वामी विवेकानंद ने अमेरिका में
हिंदी को सम्मान दिलाया था। अटल जी ने संयुक्त राष्ट्र सभा को हिंदी में संबोधित किया था। हिंदी को आकर्षित करने के लिए इसे और आगे ले जाना चाहिए। अदालतों और तहसीलों में अंग्रेजी भाषा और उर्दू का इस्तेमाल निराश करते हैं। बेहतर है कि तकनीक के माध्यम से हिंदी को संवारा जाए, जिससे यह राष्ट्र भाषा बने।
-द्वारिका प्रसाद रस्तोगी, मंत्री अवध प्रांत, अखिल भारतीय साहित्य परिषद
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अक्सर सरकारी कार्यालयों में शिलापट पर अशुद्ध भाषा लिखी होती है। इसके लिए तुरंत अपना उचित योगदान देकर उसे सही कराना चाहिये।
हिंदी के कई शब्द अंग्रेजी भाषा ने भी अपना लिए हैं। हमारी भाषा राष्ट्र की भाषा बने, न कि राजभाषा। हिंदी को राष्ट्र भाषा का सांविधानिक दर्जा देना चाहिये।
-वेद प्रकाश अग्निहोत्री, प्राचार्य, जेके कन्या महाविद्यालय कॉलेज गोला
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समाचार पत्रों के माध्यम से हिंदी का सही स्वरूप हर घर में पहुंच रहा है। भारतीय संस्कृति ने हमेशा हिंदी के संस्कार को बढ़ावा दिया है। आधुनिक काल में तकनीक ने हिंदी का विकास किया है। मीडिया और सिनेमा के जरिये दूसरे भाषी राज्य व देश के लोगों ने भी हिंदी को सीख और अपने रोजगार के लिये मुंबई में टिके हैं। जब विदेशी लोग हिंदी संगीत पर नृत्य कर सकते हैं तो हिंदी विश्व को जोड़ सकती है।
-महेंद्र कुमार
त्रिपाठी, प्रधानाचार्य, सरस्वती विद्या निकेतन इंटर कॉलेज गोला
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हिंदी विश्व की तीसरी सबसे बड़ी बोलचाल की भाषा है। तकनीक ने इसे और गति प्रदान की है और यह विश्व पटल पर पहचानी जाने लगी है। लेकिन हिंदी भाषी राज्य और देश होने के बावजूद अभी तक यह राष्ट्रभाषा के सांविधानिक दर्जे से दूर है। इस पर सबको ध्यान देना चाहिये।
-सौरभ दीक्षित, शिक्षक व लेखक, गोला