गन्ना भुगतान में देरी और मौसम की मार से रबी और खरीफ फसलों की तबाही के चलते लोग वैकल्पिक खेती की तरफ कदम बढ़ा रहे हैं। तराई में केला, स्ट्राबेरी आदि के साथ औषधीय खेती की ओर लोगों का रुझान बढ़ा है। आर्टीमीसिया की खेती काफी लोकप्रिय हो रही है। आर्टीमीसिया एक औषधीय वनस्पति है। इसकी पत्तियों का इस्तेमाल बुखार विशेषकर मलेरिया की दवा बनाने में होता है। आर्टीमीसिया की खेती किसानों के लिए काफी फायदेमंद साबित हो रही है।
जिले में आर्टीमीसिया की खेती पिछले पांच-छह साल से शुरू हुई है। प्रारंभिक दौर में इसकी खेती रमियाबेहड़ और लखीमपुर ब्लाक में शुरू हुई है। रमियाबेहड़ ब्लाक में करीब 2000 एकड़ भूमि में आर्टीमीसिया की खेती हो रही है। वहां इस खेती की सफलता को देखते हुए लखीमपुर ब्लाक में भी बंजरिया, सेहरुआ आदि गांवों के किसानों ने भी इसकी खेती शुरू की है।
आर्टीमीसिया के लिए अनुकूल है जिले की मिट्टी
आर्टीमीसिया की खेती के लिए जिले की मिट्टी और जलवायु काफी अनुकूल है। इसके लिए दोमट और बलुई मिट्टी और नम जलवायु की जरूरत होती है। अक्तूबर-नवंबर माह में पौध तैयार करने के लिए बीज डाला जाता है। पौध तैयार होने पर जनवरी में इसकी पौध रोपी जाती है। अप्रैल में इसकी पत्तियां तोड़कर दवा कंपनियों को आपूर्ति की जाती है।
कम लागत, अधिक मुनाफा
आर्टीमीसिया की खेती में लागत कम आती है और मुनाफा ज्यादा होता है। पौध लगाने के बाद दो-तीन बार सिंचाई तो करनी पड़ती है लेकिन खाद डालने की जरूरत नहीं पड़ती। बीज, पौध की रोपाई और सिंचाई मिलाकर करीब पांच हजार रुपया प्रति एकड़ खर्च आता है। इसमें 10 से 15 क्विंटल प्रति एकड़ पत्तियां तैयार होती हैं। पत्तियों की बिक्री 3500 रुपया प्रति क्विंटल होती है। एक एकड़ में 35000 से 40000 रुपये तक की उपज तैयार होती है।
विपणन का भी नहीं है झंझट
आर्टीमीसिया की पत्तियों की बिक्री का भी कोई झंझट नहीं है। मलेरिया और बुखार की दवा बनाने वाली कंपनियां फसल के लिए किसानों से संपर्क करती हैं और खेत से ही पत्तियां खरीद लेती हैं। यह कंपनियां किसानों को बीज भी उपलब्ध कराती हैं।
तराई की जलवायु और भूमि आर्टीमीसिया की खेती के लिए काफी अनुकूल है। इसकी खेती में लागत कम और मुनाफा ज्यादा होता है। मौसम की मार का भी आर्टीमीसिया की उपज पर खास असर नहीं पड़ता है।
-डॉ. सुहैल, कृषि वैज्ञानिक