कल तक जिस गांव में खुशियां बसती थी आज वहां सन्नाटा है। घाघरा नदी पिछले पांच साल से ईसानगर ब्लाक के भदईपुरवा गांव को धीरे-धीरे निगल रही है। इससे गांव का वजूद मिटने के कगार पर है। घाघरा का रौद्र रूप देखकर ग्रामीण भयभीत हैं। वे अपने ही हाथों अपने सपनों के अशियानों को तोड़कर सड़कों के किनारे खानाबदोश जिंदगी जीने को मजबूर हैं।
आज भदईपुरवा गांव अपने अस्तित्व बचाने को संघर्ष कर रहा है। करीब 500 परिवारों वाले खुशहाल गांव में अब तक करीब 450 परिवार अपने सिर से घर की छत गवां चुके है। अब गांव में सिर्फ 30 घर ही शेष बचे हैं। यहां रहने वाले लोग अपने खून पसीने की मेहनत से बनाए सपनों के अशियाने अपने ही हाथों तोड़ने को मजबूर हैं। बीते एक पखवाड़े में घाघरा की लहरों ने गांव की नई मस्जिद को पूरी तरह निगल लिया है जबकि पुरानी मस्जिद आधी नदी में समा चुकी है। इसके साथ हारुन, रामगुलाम, रामऔतार, रफीक, नफीस, सफीक, मोहम्मद सईद, जिआउल्ला, जलील, खलील, प्रकाश, सलमा समेत 100 लोगों के घरों को घाघरा निगल चुकी है।
ग्रामीण घाघरा नदी की विनाश लीला देख अपने घरों को उजाड़कर मलबा और गृहस्थी का सामान ट्रैक्टर ट्रॉलियों से लेकर सुरक्षित स्थानों की ओर पलायन करने को मजबूर हैं। प्रशासनिक उपेक्षा के चलते ग्रामीण सड़क किनारे शरणार्थियों की तरह जिंदगी जीने को मजबूर हैं। जीविका का एकमात्र साधन कृषि योग्य भूमि भी फसलों सहित कटान की भेंट चढ़ने के बाद कई ग्रामीणों के पास रोजी-रोटी की भी समस्या है।
अपना सब कुछ गवां चुके ग्रामीणों ने नदी के बीच खड़े होकर प्रदर्शन भी किया। इससें प्रशासन में हड़कंप मचा लेकिन राहत और बचाव के आश्वासनों के बाद भी प्रशासन कुछ नही कर पाया। ग्रामीणों को प्रशासन की ओर से आश्वासनों के सिवा कुछ भी नही मिल पाया है। बाढ़ नियंत्रण खंड ने भी दो दिन कटान रोकने का प्रयास करने के बाद अपने हाथ खड़े कर दिए हैं।