धनगढ़ी (नेपाल)। नेपाल के तराई क्षेत्र में बसने वाले थारू (चौधरी) समुदाय में दहेज रहित विवाह की परंपरा आज भी कायम है लेकिन बीते कुछ वर्षों में उनकी विवाह संबंधी कई पुरानी परंपराओं में बदलाव देखने को मिल रहा है। रहन-सहन, खान-पान के साथ-साथ अब शादी-विवाह की रस्में भी धीरे-धीरे आधुनिक स्वरूप ले रही हैं।
नेपाल के तराई क्षेत्र के कैलाली, कंचनपुर, बांके, बर्दिया और दांग जिलों में रहने वाले थारू समुदाय में चौधरी, कठरिया और डंगोरा तीन प्रमुख बिरादरियां निवास करती हैं। इस समुदाय की जीवनशैली, खानपान और सामाजिक रीति-रिवाज अन्य समुदायों से अलग रहे हैं। पारंपरिक रूप से थारू समाज में विवाह केवल माघ, फागुन और वैशाख, इन तीन महीनों में ही होते हैं। विवाह की तिथि पंडित द्वारा नहीं, बल्कि दोनों पक्षों की सहमति से तय की जाती है। आज भी अधिकांश शादियां बिना किसी मांग के दहेज रहित होती हैं।
पहले विवाह से पूर्व वर पक्ष द्वारा वधू पक्ष के घर दाल-चावल, नमक, तेल और सब्जी जैसी खाद्य सामग्री शगुन के रूप में भेजी जाती थी। बरात के दिन दूल्हे को सफेद वस्त्र पहनाकर सफेद पगड़ी और टोपी लगाई जाती थी। दूल्हे को डोला में बैठाकर चार लोग कंधों पर उठाकर दुल्हन के घर तक ले जाते थे, जबकि दुल्हन डोली में बैठकर आती थी, जिसे दो लोग उठाते थे।
समय के साथ इन परंपराओं में बदलाव आया है। अब डोली और डोला की जगह कार या ट्रैक्टर-ट्रॉली ने ले ली है, जिनसे दूल्हा-दुल्हन बारात के साथ आते-जाते हैं। पहले बरात गांव के द्वार पर पहुंचने पर महिलाओं द्वारा सिर पर सजी-धजी डलिया रखकर स्वागत किया जाता था। दूल्हे को पंखा करना, काजल लगाना और मुंह मीठा कराने जैसी रस्में होती थीं, जो अब लगभग विलुप्त हो चुकी हैं।
बरात आने पर दूल्हा-दुल्हन को पूजा कक्ष में बैठाकर विवाह की सभी रस्में पूरी की जाती थीं। पहले बराती एक या दो रात रुकते थे और बरात दूसरे या तीसरे दिन विदा होती थी, लेकिन अब अधिकांश शादियां एक दिन में ही संपन्न हो रही हैं और बारात शाम तक लौट जाती है। संवाद
संगीत कार्यक्रम में बजते हैं बॉलीवुड गीत-
संगीत कार्यक्रम में भी बदलाव साफ नजर आता है। पहले शादी में केवल थारू भाषा का मागर गीत-संगीत ही बजता था, लेकिन अब उसकी जगह हिंदी और नेपाली गीतों ने ले ली है। पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार होने वाले विवाह अब गिने-चुने ही रह गए हैं। फागुन माह की शुरुआत के साथ ही थारू समुदाय में शादी-विवाह का दौर शुरू हो गया है, जहां परंपरा और आधुनिकता का मिला-जुला रूप देखने को मिल रहा है।