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दुधवा में फाटा प्रबंधन से मजबूत हुई वन्यजीवों की खाद्य श्रंखला

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लखीमपुर खीरी। दुधवा टाइगर रिजर्व (डीटीआर) में वन्यजीवों की खाद्य श्रंखला को मजबूत करने के लिए फाटा प्रबंधन (ग्रासलैंड मैनेजमेंट) का विशेष प्लान तैयार किया गया है। इसके तहत घास के मैदानों को संवारने और उन्हें शाकाहारी जीवों के लिए अधिक उपयोगी बनाने का काम शुरू हो गया है। इन घास के मैदानों का प्रबंधन वैज्ञानिक ढंग से करते हुए अखाद्य घासों को हटाकर उनकी जगह वन्यजीवों की पसंदीदा घास विकसित की जा रही है।
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बाघों का कुनबा बढ़ाने के लिए भोजन, पानी, प्राकृतवास और सुरक्षा बेहद जरूरी है। करीब 2200 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैले दुधवा टाइगर रिजर्व में 22 फीसदी ग्रासलैंड यानी घास के मैदान, 66 प्रतिशत वुडलैंड यानी घने जंगल और 12 फीसदी वेटलैंड हैं।
यह प्राकृतिक ढांचा बाघों के प्राकृतवास के लिए आदर्श और अनुकूल है। बाघ शाकाहारी जीवों का शिकार कर अपना पेट भरता है, जिनकी दुधवा में कमी नहीं है। वहीं शाकाहारी जीवों को ध्यान में रखते हुए ग्रासलैंड मैनेजमेंट पर खास ध्यान दिया जा रहा है।
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करीब दो साल पहले दुधवा के घास के मैदानों के वैज्ञानिक प्रबंधन की रणनीति बनाने के लिए देश भर के विशेषज्ञों ने यहां के घास के मैदानों का अध्ययन किया था। अध्ययन में पाया गया था कि दुधवा के ग्रासलैंड में कुछ ऐसी घासें तेजी से बढ़ रही हैं जिन्हें शाकाहारी जीव नहीं खाते। तीन दिन चली इस कार्यशाला के बाद विशेषज्ञों ने तय किया कि वैज्ञानिक प्रबंधन के तहत इन अखाद्य घासों जैसे जराकुश, लेंटाना, मरोड़फली, गाजर घास आदि को हटाकर उनकी जगह प्राकृतिक रूप से उगने वाली दूब आदि घासों को विकसित किया जाए।
दुधवा टाइगर रिजर्व में फाटा प्रबंधन का काम सबसे पहले किशनपुर सेंक्चुरी में शुरू किया गया है। यहां घास के मैदानों से वन्यजीवों के लिए हानिकारक और अखाद्य घासों को हटाकर उनकी जगह दूब आदि घास विकसित की जा रही हैं। किशनपुर सेंक्चुरी में दो ऐसे घास के मैदान हैं जिनका स्वरूप ही बदल गया है। इन घास के मैदानों में अब विभिन्न प्रजातियों के हिरन बड़ी संख्या में देखे जा रहे हैं। जहां दूब घास लगाई गई है, वहां हरी कालीन सी बिछी दिखाई देती है।
ऐसा माना जाता है कि जहां शाकाहारी जीवों की संख्या अधिक होती है वहीं बाघों की संख्या भी तेजी से बढ़ती है। किशनपुर सेंक्चुरी में समृद्घ खाद्य श्रंखला की वजह से ही सौ किलोमीटर क्षेत्र में 18 बाघ मौजूद हैं। किशनपुर सेंक्चुरी में वैज्ञानिक फाटा प्रबंधन की सफलता के बाद यही प्रयोग दुधवा टाइगर रिजर्व के अन्य क्षेत्रों में भी किया जाएगा।
कई हानिकारक घासें नष्ट कर रहीं घास के मैदान
पिछले कुछ वर्षों में दुधवा टाइगर रिजर्व के अंदर लेंटाना, जराकुश, मरोड़फली, गाजर घास आदि ऐसी घासों का तेजी से विकास हुआ है जिनके कारण दुधवा के घास के मैदानों का अस्तित्व ही खतरे में पड़ रहा है। अब इन घासों को हटाने का काम किया जा रहा है ताकि शाकाहारी वन्यजीवों के लिए खाने योग्य घासों को पनपने का मौका मिल सके।
बाघों की आबादी बढ़ने के लिए टाइगर रिजर्व की खाद्य शृंखला का समृद्घ होना जरूरी है। अच्छे घास के मैदान होने से शाकाहारी वन्यजीवों की संख्या बढ़ती है जो बाघों का भोजन हैं। दुधवा टाइगर रिजर्व में घास के मैदानों का वैज्ञानिक प्रबंधन कर अखाद्य घासों को हटाकर उनकी जगह शाकाहारी वन्यजीवों की पसंदीदा घासों का विकास किया जा रहा है। इससे आने वाले समय में अच्छे परिणाम आने की संभावना है।
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- संजय पाठक, फील्ड डायरेक्टर, दुधवा टाइगर रिजर्व
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