डीटीआर में लुप्तप्राय प्रजातियों
के संरक्षण का हो रहा प्रयास
दुधवा के 51 स्तनपायी जीवों में 11 प्रजातियां लुप्तप्राय श्रेणी में, पक्षियों की भी नौ प्रजातियां खतरे में
लखीमपुर खीरी। विभिन्न कारणों से धरती पर पारिस्थितिकी (इकोसिस्टम) में हो रहे बदलाव के कारण जीवों की बहुत सी प्रजातियां लुप्त हो चुकी हैं तो वहीं सैकड़ों प्रजातियां लुप्त होने की कगार पर हैं। दुधवा टाइगर रिजर्व में इन लुप्त हो रहीं प्रजातियों को बचाने का प्रयास हो रहा है। यहां बता दें कि दुधवा टाइगर रिजर्व (डीटीआर) में बारहसिंघा, बाघ, हाथी, गैंडा, भालू और मगरमच्छ और बंगाल फ्लोरिकन जैसे दुर्लभ जीवों का यहां बेहतर ढंग से संरक्षण हो रहा है।
तेजी से लुप्त हो रही हिरन की बारहसिंघा प्रजाति के संरक्षण के लिए सबसे पहले 1861 में मोहाना और सुहेली नदियों के बीच 775 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र को आरक्षित वन क्षेत्र घोषित किया गया। 19वीं सदी के अंत में बारहसिंघा को सर्वोच्च संरक्षण प्रदान करने के लिए 15.7 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र को अभ्यारण्य घोषित करते हुए सोनारीपुर सेक्च्युरी नाम दिया गया। बाद में 212 वर्ग किलोमीटर वनक्षेत्र को दुधवा सेक्चयुरी बनाया गया। 1977 में इसका दायरा बढ़ाकर 614 वर्ग किलोमीटर कर दिया गया, इसे दुधवा नेशनल पार्क का नाम मिला। 1984 में बाघों के संरक्षण के लिए दुधवा नेशनल पार्क में किशनपुर सेंक्च्युरी को जोड़कर इसे दुधवा टाइगर रिजर्व का दर्जा दिया गया।
यह वन्यजीव हैं लुप्तप्राय प्रजाति की श्रेणी में
दुधवा टाइगर रिजर्व में मिलने वाली 51 स्तनधारी प्रजातियों में 11 प्रजातियों को लुप्तप्राय श्रेणी में रखा गया है। इनमें काला हिरन, फिसिंग कैट, हिस्पिड हेयर, हाथी, गुलदार, बाघ, लेपर्ड कैट, भालू, पैंगोलीन, रैटेल, बारासिंघा, गैंजेटिक डॉलफिन और जांइट फ्लाइंग स्कवैरेल शामिल हैं, जबकि एंफीबियन और रेप्टाइल श्रेणी में मगर, घडियाल, गैंजेज साफ्ट शेल्ड टर्टिल, इंडियन साफ्ट सेल्ड टर्टिल, पीकाक साफ्ट शेल्ड सर्किल इंडियन टेंट टट्रिल, अेरापेन बटागुर बसक, ईस्टर्न हिल टेरापेन, सेल टेरापेन ओर स्पाटेड टेरापेन को लुप्तप्राय श्रेणी में रखा गया है। इनके अलावा बंगाल फ्लोरिकन समेत नौ प्रजातियों के पक्षियों को लुप्तप्राय प्रजाति की श्रेणी में रखा गया है।
खाद्य शृंखला मजबूत करने के लिए बढ़ाई जा रही है हिरनों की संख्या
एक सींग वाले गैंडों के संरक्षण और संवर्धन के लिए 1984 से दुधवा में गैंडा पुनर्वासन योजना चलाई जा रही है। टाइगर रिजर्व बनने के बाद बाघों के संरक्षण और संवर्धन के साथ साथ खाद्य शृंखला मजबूत करने के लिए हिरनों की संख्या बढ़ाने का भी प्रयास हो रहा है। इसके लिए ग्रासलैंड और वेट लैंड मैनेजमेंट को बेहतर किया जा रहा है। एक तरफ गैंडों की प्रजाति को बचाने के लिए गैंडा पुनर्वासन योजना चल रही है, वहीं हाथियों का कुनबा बढ़ाने के लिए तराई एलीफैंट रिजर्व बनाने की तैयारी चल रही है। कर्तनियाघाट वन्यजीव विहार में मगरमच्छों की आबादी बढ़ाने का प्रयास चल रहा है। उत्तर भारत में केवल दुधवा टाइगर रिजर्व में ही बंगाल फ्लोरिकन संरक्षण पा रहे हैं।
दुधवा टाइगर रिजर्व में बेहतर प्रबंधन के जरिए लुप्त हो रहे वन्यजीवों के संरक्षण और संवर्धन का प्रयास हो रहा है। दुधवा टाइगर रिजर्व जैव विविधता के लिहाज से बेहद समृद्घ है। बाघों के संरक्षण के साथ साथ गैंडा पुनर्वासन योजना के जरिए गैंडों का संरक्षण और संवर्धन का प्रयास हो रहा है। अब एलीफैंट रिजर्व बनने से हाथियों के संरक्षण को नए आयाम मिलेंगे। बारहसिंघा के संरक्षण के प्रयास पहले से ही चल रहे हैं।
- संजय पाठक, फील्ड डायरेक्टर, दुधवा टाइगर रिजर्व