लखीमपुर खीरी। कोरोना काल में उद्योग-धंधों से कहीं अधिक बच्चों की पढ़ाई-लिखाई प्रभावित हुई है। हाईस्कूल से इंटर तक स्कूल-कालेज खोले जा चुके हैं। वहीं डिग्री कालेज भी आज से खुल जाएंगे, लेकिन कक्षा एक से आठ तक के जूनियर स्कूल अभी नहीं खोले गए हैं और न ही जल्द खुलने की उम्मीद नजर आ रही है। ऐसे अनिश्चितता के हालात में बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह चौपट हो चुकी है। वहीं अभिभावकों की चिंता बढ़ती जा रही है। स्कूल प्रबंधन ऑनलाइन क्लासेज के जरिए बच्चों का कोर्स पूरा कराने की बात कह रहा है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में खराब नेटवर्क बच्चों की ऑनलाइन क्लासेज में सबसे बड़ी बाधा है। जबकि 70 फीसदी बच्चों के पास स्मार्टफोन/इंटरनेट की सुविधा नहीं है।
मार्च 2020 में लागू हुए लॉकडाउन के बाद से बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह चौपट है। वहीं ऑनलाइन पढ़ाई भी बच्चों को रास नहीं आ रही, क्योंकि ज्यादातर बच्चों के पास स्मार्टफोन की सुविधा नहीं है। गांवों में इंटरनेट के नेटवर्क की समस्या भी बनी हुई है। ऐसे में अप्रैल, मई, जून, जुलाई, अगस्त माह की प्राइवेट स्कूलों की भारी-भरकम फीस जमा करने में अभिभावक असमर्थ हैं। काफी अभिभावक ऐसे भी हैं, जो अभी तक बच्चों का कोर्स भी नहीं खरीद पाए हैं। रोजगार-धंधे पर पहले से ही कोरोना संक्रमण का ग्रहण लगा हुआ है। ऐसे में बकाया फीस को लेकर अभिभावकों में काफी बेचैनी है, जिसे माफ करने के लिए अभिभावक संघ कई बार ज्ञापन देकर सरकार से गुहार लगा चुके हैं। कई सेवा क्षेत्रों में लॉकडाउन अवधि अप्रैल से जून तक ब्याज/कर आदि माफ किया जा चुका है, जिससे उम्मीद लगाए अभिभावक भी फीस जमा नहीं कर पाए हैं। सरकार ने अभी तक अभिभावकों को राहत देने के संबंध में कोई निर्णय नहीं लिया है। वहीं जिला प्रशासन भी इस मामले में कोई निर्णय लेने की स्थिति में नहीं है। अभी तक फीस को एक-एक महीने में जमा करने की सहूलियत देने के नाम पर अभिभावकों को छला गया है। इससे अभिभावकों की मुश्किलों का कोई समाधान नहीं हुआ है। जिनका व्यापार चौपट रहा, वो फीस के पैसे कैसे जुटाएंगे। वहीं अप्रैल से दिसंबर 2020 तक की फीस जमा करने के लिए स्कूल प्रबंधन लगातार अभिभावकों पर दबाव बनाता जा रहा है।
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जब स्कूल ही बंद तो फीस देने का औचित्य ही क्या
बांकेगंज निवासी अभिभावक कौशल किशोर मिश्रा का पोता कस्बा के एक निजी स्कूल में कक्षा चार में पढ़ता है। उन्होंने कहा कि कोरोना संक्रमण के चलते पिछले नौ माह से स्कूल बंद पड़े हैं। जब हमारा पोता नौ माह से स्कूल ही नहीं गया, तो फीस देने का औचित्य ही क्या है।
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पढ़ाई नहीं तो फीस भी नहीं
दौलतपुर गांव निवासी अभिभावक प्रेमचंद्र का पुत्र कस्बे के एक निजी स्कूल में कक्षा छह का छात्र है। उनका कहना है कि कोविड-19 के चलते मार्च से स्कूल बंद चल रहे हैं। कोरोना संक्रमण के चलते कमाई का जरिया बंद हो गया। ऐसे में घर खर्च चलाना मुश्किल है। जब स्कूल में पढ़ाई नहीं हुई तो फीस क्यों दें। उन्होंने स्कूल बंद होने से खुलने तक फीस माफ करने की मांग की है।
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ऑनलाइन भी पढ़ाई नहीं हो रही
अर्जुनपुर गांव निवासी अभिभावक परमेश्वर लाल की दो पुत्री और एक पुत्र बांकेगंज कस्बा के एक निजी स्कूल में क्रमश: कक्षा आठ और दो में पढ़ाई करते थे। उनका कहना है कि कोरोना संक्रमण के चलते घर और बच्चों का खर्च चलाना मुश्किल हो रहा है। यहां तो ऑनलाइन पढ़ाई भी नहीं होती, ऐसे में क्यों दें फीस। सरकार को निजी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की फीस माफ करनी चाहिए।
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निजी स्कूलों को माफ कर देनी चाहिए साल भर की फीस
अभिभावक अजय कुमार का पुत्र बांकेगंज के एक निजी स्कूल में कक्षा एक का छात्र है। इनका कहना है कोरोना काल में लोगों की दाल-रोटी बमुश्किल चल पा रही है। ऐसे में बच्चों की भारी-भरकम फीस कहां से जमा करें। उन्होंने मांग की है कि निजी स्कूलों को बच्चों की साल भर की फीस माफ कर देनी चाहिए, जिससे अभिभावकों की चिंता दूर हा सके।
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परिषदीय स्कूलों में अभी कक्षा एक से आठ तक के बच्चों को नहीं बुलाया जा रहा है। व्हाट्सएप ग्रुप के जरिए बच्चों को होमवर्क दिया जा रहा है। प्राइवेट स्कूलों में भी कक्षा एक से आठ तक की कक्षाएं संचालित नहीं हुई हैं। इस संबंध में शासन स्तर से मिलने वाले निर्देशों का अनुपालन कराया जाएगा। प्राइवेट स्कूलों की फीस माफ करने के संबंध में भी सरकार स्तर से कोई निर्णय लिया जा सकता है।
-बुद्ध प्रिय सिंह, बीएसए