गोला गोकर्णनाथ। देवोत्थानी एकादशी का वैदिक धर्म में विशेष महत्व है। इस दिन से सभी शुभ कार्यों की शुरुआत होती है और भगवान विष्णु के जागरण के साथ ही संपूर्ण सृष्टि में नई ऊर्जा का संचार होता है। ऐसी मान्यता है।
नगर निवासी ज्योतिषाचार्य पंडित रामदेव मिश्रा शास्त्री ने बताया कि देवोत्थानी एकादशी (जिसे प्रबोधिनी एकादशी या देवउठनी ग्यारस भी कहा जाता है) का पर्व कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाया जाता है। ये इस बार 12 नवंबर मंगलवार को देवोत्थानी एकादशी पड़ रही है और त्रिस्पर्शा योग भी बन रहा है। जब एक ही दिन में एकादशी, द्वादशी और त्रयोदशी तिथि आती है, तो इसे त्रिस्पर्शा योग कहते हैं। यह योग भगवान विष्णु को बहुत प्रिय है।
इस दिन व्रत-उपवास, स्नान-दान और भगवान विष्णु की पूजा करने से जाने-अनजाने में हुए पाप खत्म हो जाते हैं। यह दिन भगवान विष्णु के योग निद्रा से जागरण का प्रतीक है। जब भगवान विष्णु चतुर्मास के अंत में शयन से जागते हैं। इसे वैदिक धर्म में अत्यंत शुभ माना जाता है, क्योंकि इस दिन से सभी मांगलिक कार्यों का आरंभ किया जाता है, जैसे कि विवाह, गृहप्रवेश और अन्य धार्मिक संस्कार।
ऋग्वेद और विष्णु पुराण जैसे वैदिक ग्रंथों में चतुर्मास और भगवान विष्णु के शयन एवं जागरण का उल्लेख मिलता है। विष्णु पुराण में कहा गया है कि देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु योग निद्रा में चले जाते हैं और कार्तिक शुक्ल एकादशी को जागते हैं। इस दिन की महिमा का वर्णन भी पुराणों में मिलता है और यह दिन भगवान विष्णु के भक्तों के लिए विशेष पुण्यदायक माना जाता है।