बाजार में रखे मिट्टी के बर्तन। संवाद
लखीमपुर खीरी। शादी-विवाह का सीजन शुरू होते ही जहां स्टील, पीतल और तांबे के बर्तनों की खरीद बढ़ जाती है। वहीं, कुम्हारों की ओर से बनाए जा रहे पारंपरिक मिट्टी के बर्तनों की मांग भी तेजी से बढ़ने लगी है। विवाह के शुभ कार्यों में मिट्टी से बने बरगा, मटकी व आकर्षक डिजाइन वाले कलश और दीये विशेष रूप से उपयोग किए जाते हैं, इसके चलते स्थानीय कुम्हारों का व्यापार फिर से रफ्तार पकड़ रहा है।
दीपावली के बाद आमतौर पर कुम्हारों के काम में गिरावट आ जाती है, जिससे उनके सामने रोजगार का संकट खड़ा हो जाता है। लेकिन शादी के सीजन में पूजा-अर्चना के लिए मिट्टी के बर्तनों की बढ़ती जरूरत उनकी आजीविका में नई उम्मीद भर देती है।
कुम्हारों का कहना है कि यदि प्रशासन और स्थानीय समाज मिलकर पारंपरिक मिट्टी के बर्तनों को बढ़ावा दें, तो यह सदियों पुराना हुनर न सिर्फ जीवित रह सकेगा बल्कि और अधिक लोगों के लिए रोजगार का साधन भी बन सकता है।
दीपावली के बाद काम बहुत कम हो जाता है। कई बार तो घर चलाना भी मुश्किल होने लगता है, लेकिन जैसे ही शादियों का सीजन आता है, हमारे बने बरगा, कलश और दीये खूब बिकते हैं। इससे फिर से कमाई शुरू हो जाती है।
- दिनेश, कुम्हार
शादी की पूजा में मिट्टी के बर्तन जरूरी माने जाते हैं। लोग खास तौर पर डिजाइन वाले कलश और पूजा में इस्तेमाल होने मटकी मांगते हैं। इस मौसम में हमारा व्यापार लगभग दोगुना तक बढ़ जाता है।
- परमेश्वर दीन, कुम्हार
बाजार में रखे मिट्टी के बर्तन। संवाद
बाजार में रखे मिट्टी के बर्तन। संवाद
बाजार में रखे मिट्टी के बर्तन। संवाद