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‘...मगर धरती की बेचैनी तो बस बादल समझता है’

Fri, 16 Sep 2016 10:47 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो/लखीमपुर खीरी।
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kavia - फोटो : amar ujala
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कवि जगदीश अवस्थी के 80वें जन्म दिवस पर अखिल भारतीय कवि सम्मेलन
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जिले के वरिष्ठ साहित्यकार कवि जगदीश अवस्थी के 80वें जन्म दिवस पर गुरुवार की रात मौजी नसीरुद्दीन भवन प्रांगण में  एक विराट कवि सम्मेलन हुआ। इस मौके पर जगदीश अवस्थी के द्वितीय काव्य संग्रह समर्पण का लोकार्पण खीरी सांसद अजय मिश्रा टेनी ने किया।  
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नसीरूद्दीन मौजी हाल परिसर में हुए अखिल भारतीय कवि सम्मेलन का शुभारंभ डॉ.सरिता शर्मा ने सरस्वती वंदना की प्रस्तुती से की। कवि सम्मेलन का संचालन अंतरराष्ट्रीय कवि कुमार विश्वास ने किया।  सरस्वती वंदना के बाद डॉ.सरिता शर्मा दिल्ली ने पढ़ा कि- 
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तेरी आंखों का नूर हो जाऊं, सारी दुनिया से दूर हो जाऊं। 
तेरी राधा बनूं ना बनूं, तेरी मीरा जरूर हो जाऊं। 
बाराबंकी से आए हास्य कवि गजेंद्र प्रियांशु ने श्रोताओं को तालियां बजाने पर मजबूर कर दिया
 तुम संवरते संवरते हुई सैफई, मैं उजड़ के मुजफ्फरनगर हो गया। 
जबलपुर से आए हास्य कवि सुदीप भोला ने गुदगुदाया-
सारे मोदी के विरोधियों में मेल हो गया, 
उसके बाद भी मम्मी का पप्पू फेल हो गया। 
वहीं कवि तेज नरायन बेचैन मुरैना ने वाहवाही बटोरी-
 मंच जब से अर्थ दायक हो गए, 
तोतले भी गीत गायक हो गए।
राजनीतिक मूल्य कुछ ऐसे गिरे, 
जेबकतरे तक विधायक हो गए। 
हास्य कवि सर्वेश अस्थाना ने गुनगुनाया-
क्या बतलाऊं इस धरती पर कैसा लगता है, 
लोग जहां अच्छे होते हैं अच्छा लगता है। 
इसके बाद दिल्ली से आए पदमश्री कवि सुनील जोगी ने मंत्रमुग्ध किया-
धरने पर बैठ बैठ के धनवंतरि हुए, 
वो आम आदमी थे मगर तंत्री हुए। 
हम चीख चीखकर संतरी न बन सके, 
वो खांस खांस कर के मुख्यमंत्री हुए। 
वहीं लखनऊ से आए रमेश रंजन मिश्र ने समां बांधा-
 न तू हुआ हमारा न मै तेरा हो गया, 
तेरी बस बस न न में सवेरा हो गया। 
इसके बाद कानपुर से आई  कवियत्री शबीना अदीब ने वाहवाही बटोरी
खामोश लब हैं, झुकी हैं,
पलके दिलों में उल्फत नई नई हैं। 
अभी तकल्लुफ है कुछ ज्यादा,
अभी मुहब्बत नई नई है। 
इसके बाद अंतरराष्ट्रीय कवि डॉ.कुमार विश्वास ने डेढ़ घंटे तक लोगों को मंत्रमुग्ध किया। उनके मशहूर काव्य पर श्रोता गुनगुना उठे
मोहब्बत एक एहसासों की पावन सी कहानी है, 
कभी कबिरा दीवाना था कभी मीरा दीवानी है। 
यहां सब लोग कहते हैं मेरी आंखों में आंसू हैं, 
जो तू समझे तो मोती है जो न समझे तो पानी है। 
वहीं उन्होंने अपनी सर्वाधिक लोकप्रिय कविता पढ़ी तो श्रोता झूम उठे। डा. कुमार विश्वास ने कुछ यूं गुनगुनाया
कोई दीवाना कहता है कोई पागल समझता है।
मगर धरती की बेचैनी तो बस बादल समझता है।।
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