दुआएं और अमर उजाला की कोशिश असर कर गई। 20 साल पहले बरेली के जेपी गुप्ता न जाने किस बात पर रूठे कि अपनी बेटियों और दामाद को छोड़कर घर से निकल लिए। इन 20 वर्षों में अपनों की ओर मुड़कर नही देखा। बेटियां थीं कि उन्हें अपने पापा के वापस आने का हमेशा इंतजार रहा। बिजुुआ के सरकारी अस्पताल के बेड न. 25 पर जिस दिन बुजुर्ग भर्ती किए गए, अमर उजाला ने इस संबंध में दास्तां प्रकाशित की और अंतत: बेटियों तक खबर पहुंच ही गई।
मुन्ना भाई एमबीबीएस फिल्म तो आपने देखी होगी, इस फिल्म की कहानी के किरदार भी कुछ याद होंगे, अस्पताल में भर्ती पैरालायसिस के मरीज की लोग फिर से ठीक होने की उम्मीद छोड़ चुके थे लेकिन लोगों से मिला अपनापन उसे ठीक करता है। बस यही कहानी बिजुआ अस्पताल में भी दोहराई गई, बस कहानी में थोड़ा बदलाव आ गया। यहां अस्पताल में बेड न. 25 पर भर्ती जेपी गुप्ता के दवा और खाने की जालंधर स्थित एक होटल के जनरल मैनेजर शिवाशीष गुप्ता उर्फ राजन ने जिम्मेदारी उठाई, तो वह फिर से चलने-फिरने लगे। अमर उजाला में बुजुर्ग की दास्तां पढ़कर उनकी बेटियों को एक शख्स ने ढूूंढ निकाला। शुक्रवार को बुजुर्ग जेपी गुप्ता की मंझली बेटी पिंकी और दामाद करन उन्हें ढूंढते हुए बिजुआ अस्पताल पहुंच गए। सामने पापा को देखकर बेटी के बोल नहीं निकले बस आंखें ही सबकुछ बयां करती रहीं।
परिवार वाले जिंदा होने की छोड़ चुके थे उम्मीद
बेटी पिंकी ने बताया कि तीन दिन पहले कोई शख्स आया। उसने बताया कि उनके पापा जिंदा हैं और अब बिजुुआ में भर्ती हैं, उसे पहले तो यकीन नही हुआ फिर वह अपने पति के साथ यहां पहुंच गई।
बोले- हमारे लिए तो फरिश्ते से हैं आप लोग
बेटी पिंकी बोली कि जिस जिस ने मेरे पापा को आसरा दिया है मेरे लिए वे सब फरिश्ते हैं। अमर उजाला ने मेरे पापा का वनवास खत्म करा दिया है। पापा की भी आंखें भर गईं। बाद में वह अस्पताल के डॉक्टर रोहित पाठक, दवा और खाने की व्यवस्था करने वाले दीपक के परिवार और अमर उजाला के रिपोर्टर से मिलकर घर चल दिए। चलते-चलते इतना जरूर बोले, घर आना मेरी छोटी सी दुनिया में आप सब मेहमान बनकर।