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तबाही के जख्म छोड़ गई शारदा और घाघरा की बाढ़

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स्लग- शारदा और घाघरा नदियों की बाढ़ ने दिए जख्म
हर तरफ भुखमरी, गरीबी और बीमारी

अमर उजाला ब्यूरो
लखीमपुर खीरी। शारदा और घाघरा नदियों ने न केवल लोगों के आशियाने उजाड़े बल्कि खेती की जमीन और समूची फसल भी लील ली है। सैकड़ों परिवार बेघर हो चुके हैं। वे खानाबदोशों की तरह जिंदगी गुजर बसर करने को विवश हैं। कुछ परिवार के लोग तटबंध तो कुछ ने सड़क के किनारे तिरपाल डालकर रहना शुरू किया है। पीड़ितों को कुछ सरकारी इमदाद मिली भी तो वह ना काफी साबित हुई है। बाढ़ और कटान पीड़ितों को जो जख्म मिला है उसे भरने में लंबा समय लगेगा।
सरकारी आंकड़ों पर नजर डालें तो अब तक बाढ़ और कटान से 56477 लोग प्रभावित हुए हैं जब कि बाढ़ से 10 लोगों की जान भी जा चुकी है। अब बाढ़ प्रभावित इलाके में बीमारियों ने भी पैर पसारना शुरू कर दिया है। लोगों के लिए इलाज करा पाना भी मुश्किल हो रहा है।
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बाढ़ कटान से अब तक हुआ नुकसान
बाढ़ से प्रभावित जनसंख्या 56477
जनहानि 10
पशुहानि 04
कुल प्रभावित क्षेत्रफल 6900.089 हेक्टेयर
प्रभावित कृषि योग्य भूमि 3368.429 हेक्टेयर
प्रभावित फसली क्षेत्रफल 3317.109 हेक्टेयर
कटान प्रभावित क्षेत्रफल 474.673 हेक्टेयर
फसल की अनुमानित क्षति 1740.92 लाख
पूर्णतया क्षतिग्रस्त पक्के मकान 09
पूरी तरह क्षतिग्रस्त कच्चे घर 14
आंशिक क्षतिग्रस्त पक्के मकान 08
क्षतिग्रस्त झोपडिय़ों की संख्या 95



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शारदा की बाढ़ ने बना दिया खानाबदोश
महेवागंज। बैजनाथपुरवा ग्रामसभा ग्रंट 12 का बेहद खुशहाल गांव होता था। एक हजार से ज्यादा आबादी थी। शारदा नदी की बाढ़ ने जब यहां कहर बरपाया तो समूचा गांव नदी में समा गया। दर्जनों परिवार बेघर हो गए। लोग जैसे तैसे गुजर बसर करने को विवश हैं। मिलपुरवा बंधे पर त्रिपाल में कुछ बच्चों को देखा जा सकता है। यहीं बैठे जगजीवन ने अपने को कटान पीड़ित बताया और फफक कर रो पड़े। वह बीस एकड़ जमीन के जोतकर थे। पक्का मकान था, बच्चे अच्छे स्कूल में पढ़ने जाते थे। करीब दो माह पहले घर, जमीन सब कुछ नदी में समा गया। यही स्थिति आधे से ज्यादा गांव के लोगों की है।


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कई परिवार भुखमरी से जूझ रहे
महेवागंज। खगईपुरवा गांव में ज्यादातर लोग मजदूरी पेशा हैं। कच्चे घरों वाली बस्ती में गरीबी दूर से झलकती है। बाढ़ में अधिकांश घर ढह गए हैं। विवश होकर लोगों ने पास के ही तटबंध पर झोपड़ी बनाकर रहना शुरू किया है। जो गांव दो महीने पहले हंसी ठिठोली से गुलजार हुआ करता था अब वहां सन्नाटा है। रास्ते खराब हो चुके हैं। खड़ंजे उखड़ गए हैं। गांव के घनश्याम, डालचंद, हिमा देवी, मनोज आदि बताते हैं कि कभी गांव के लोग खुशहाल हुआ करते थे लेकिन अब जैसे तैसे राशन तेल आदि का भी इंतजाम नहीं हो पा रहा है। कई परिवार भुखमरी से जूझ रहे हैं।


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बाढ़ के बाद बीमारियों से जूझ रहे लोग
महेवागंज। बहालीपुरवा गांव और मेंहदी को जोड़ने वाला मुख्य मार्ग भी कट गया है। बड़ागांव से मेंहदी जाना भी मुश्किल हो रहा है। मेंहदी गांव में खड़ंजा उखड़ चुका है। लोग कीचड़ से होकर निकलने को विवश हैं। तटबंध से पांच किलोमीटर जाना लोगों को काफी भारी पड़ रहा है। अधिकांश लोग गांव छोड़ चुके है। यहां तटबंध ही अब नया बसेरा बना है। बच्चे भी बुखार में तप रहे है। इतने पैसे नही कि उनका अच्छा इलाज हो सके।
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घर में नहीं बचा अनाज
धौरहरा। चिकनाजती गांव में बाढ़ ने ग्रामीणों को सड़क पर ला दिया है। गांव को जाने वाली सड़क पर एक सरकारी तिरपाल के नीचे चारपाई पर बैठी मोतीलाल की पत्नी रामकली मिली। इन्होंने बताया कि पति मजदूरी करने गए हैं। घरों में जो थोड़ा बहुत अनाज था वह सड़ गया। खेत जिसमें धान लगाया था वह भी नदी में समा गया। अब कैसे जिंदगी कटेगी भगवान ही जाने। आगे कुछ दूरी पर पंचायत भवन पहुंचने पर बाढ़ कटान पीड़ित लालाराम, रामऔतार, भवंरकली, शिवराम, मुरारीलाल, टीकाराम, छोटेलाल परिवार सहित बैठे मिले। सभी ने बताया कि घर और जमीन नदी में समा चुकी है। न अब रहने को घर है न खाने को दाना। बस किसी तरह जिंदगी की गाड़ी खींच रहे हैं।
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