बिहार समेत पूरे पूर्वांचल में मनाई जाने वाली छठ पूजा अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई घरों तक में पहुंच गई है। पूरब से पश्चिम तक आने में इस परंपरा ने करीब एक हजार किलोमीटर का फासला इस पर्व ने तय किया है, इसलिए करीब 60 फीसदी मान्यताएं, रीतिरिवाज और परंपराएं यहां बदल गई हैं। लखीमपुर खीरी में आकर बसे बिहार और पूर्वांचल के परिवार आज भी उतनी ही शिद्दत और आस्था से छठ पर्व मनाते हैं, लेकिन समय और सुविधाएं न होने से कई पुरानी परंपराओं को निभाना मुश्किल हो गया है। पर्व के मायने आज भी वही हैं, लेकिन इसे मनाने के तरीके में हल्का-फुल्का परिवर्तन आया है। लखीमपुर में रहने वाली पूर्वांचल की कुछ महिलाओं से बातचीत में ऐसे ही बदलाव को समझा गया। पेश है बदलाव में आई रिपोर्ट-
पूरब की परंपरा
- व्रत करने वाली महिलाएं जमीन पर ही सोएंगी। सफेद सूती धोती को पीले रंग में रंगकर पहना जाता है।
- कोई भी सिला वस्त्र धारण नहीं किया जाता। सिर्फ एक ही धोती तीन दिन के व्रत में पहनी जाती है।
- घर पर चक्की से गेहूं पीसकर पूजा के लिए आटा तैयार किया जाता है।
- मिट्टी और ईंट के चूल्हे पर आम की लकड़ी जलाकर खरना बनाते हैं।
- केले के पत्ते में ही खरना खाते हैं और फिर उसे छिपा देते हैं।
- ठेकुआ बनाने के लिए गेहूं को बहुत सफाई से रखते हैं। चिड़िया भी चोंच लगा दे तो अपवित्र होना मानते हैं। घाट पर ही जाकर सूर्य को अर्घ्य देते हैं।
पश्चिम की पूजा
- बहुत संभव नहीं हो पाता की व्रती जमीन पर सोएं।
- पीली सूती धोती की तरह तमाम नए परिधान पहने जाते हैं।
- बिना सिले वस्त्रों में कोई नजर नहीं आता। यांत्रिक चक्की में गेहूं पीसा जाता है।
- कच्चा चूल्हे की जगह गैस चूल्हे पर बनाते हैं खरना। केले के पत्ते उपलब्ध न होने पर थाली में परोसा जाता है खरना।
- ठेकुआ बनाने में कोई गलती न हो जाए, इसलिए कई घरों में इसे बनाते ही नहीं।
- आसपास घाट न होने पर घर में ही अस्थाई पोखर या टब में खड़े होकर अर्घ्य देती हैं। मजबूरी में सीमेंट के पक्के हौज में भी सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है।
इनसे सुनिए परंपरा
छठ पूजा के व्रत में साफ सफाई का विशेष ध्यान दिया जाता है। चार दिनों तक लहसुन प्याज से हम लोग बिल्कुल दूर रहते हैं। यह व्रत कठिन होता है, लेकिन हमें बहुत नियम नहीं मालूम। जैसा अन्य महिलाएं बताती है, वैसा ही कर लेते हैं।
- रेखा पटेल, मोहल्ला शाहपुरा कोठी।
गाजीपुर से जब हम लोग लखनऊ आए थे तो कुछ साल पूजा में बिल्कुल रुचि नहीं रही, क्योंकि वहां हमें अच्छा घाट नहीं मिल पाया, लेकिन यहां इस साल अच्छी व्यवस्था की गई है। इस बार घाट में साफ पानी भी है और भीड़ भी खुद है, इसलिए बहुत अच्छा लगा।
- ऋचता वर्मा, निकट सिविल लाइंस
पहले यहां ज्यादा लोग छठ पूजा नहीं करते थे, लेकिन अब बहुत भीड़ होती है। छठ पूजा हमेशा डौरा यानी बांस की डलिया में होनी चाहिए। न मिले तो पीतल या तांबे की डलिया का प्रयोग कर सकते हैं। पूर्वांचल में इस पूजा के काफी कठिन नियम हैं, लेकिन जितना हो पाता है, उतना ही हम करते हैं।
- प्रीती देवी, शाहपुरा कोठी।
छठ पूजा में तीन दिन का कठिन व्रत होता है, लेकिन कुछ लोग तो एक दिन का ही व्रत रखते हैं। लोगों के पास समय नहीं है। हर कोई घर के साथ कुछ काम भी संभालता है, इसलिए छह नियमों को लेकर गंभीर नहीं मिलता।
- पूनम देवी, मोहल्ला-नई बस्ती।