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सूख गई गोमती की सहायक सरायन नदी
सरकारी सिस्टम और पर्यावरण से जुड़ी संस्थाओं ने मोड़ रखा है मुंह
गोला गोकर्ण नाथ। अपनी जलधारा से छोटीकाशी और सीतापुर जिले की धरती को सींच कर हरा भरा रखने वाली गोमती नदी की सहायक सरायन नदी अब सूख चुकी है। इस इलाके में धूल उड़ रही है। इससे नदी का अस्तित्व समाप्त सा जान पड़ रहा है। सरकार और पर्यावरण से जुड़ी संस्थाओं का ध्यान अब तक इस तरफ नहीं गया है या फिर इस तरफ से सभी ने मुंह मोड़ रखा है।
यह नदी गोला खुटार मार्ग पर बसे अहमदनगर गांव के पास एक कुएं नुमा जगह से निकली थी। नदी का उद्गम स्थल काफी पहले ही पानी से खाली हो चुका है। इस गांव की 107 वर्षीय रम्मो, 93 वर्षीय रामस्वरूप, 88 वर्षीय श्रवण शुक्ला, 77 वर्षीय सुरेश मिश्र बताते हैं कि जहां पहले नदी का उद्गम स्थल था वहां पर अब फसलें खड़ी हैं। इस गांव से निकलकर सरायन नदी गांव छितौनियां और बहेरा को विभाजित करते हुए मोहम्मदी मार्ग पार कर ग्राम कस्ता के पास बहती हुई सीतापुर शहर होकर गोमती नदी में मिल जाती है। जिले में इस नदी की लंबाई लगभग 78 किलोमीटर है। अतीत में इस नदी का पानी चठिया, छितौनिया, बहेरा, कंजा, अलियापुर, पिपरिया डीह, काजरकोरी आदि गांव में सिंचाई के काम आता था। किसानों का कहना है कि सरायन नदी में जमा होती जा रही मिट्टी से नदी क्षेत्र उथला हो चुका है। उसके प्राकृतिक स्रोत सूख गए है। जब तक प्राकृतिक स्रोत को फिर से नहीं खोला जाएगा तब तक हालात नहीं बदलेंगे। इसमें सरकारी मशीनरी के साथ क्षेत्रीय लोगों को भी सक्रिय भागीदारी करते हुए नदी को पुनर्जीवित करने का बीड़ा उठाना होगा।
औद्योगिक कचरे से नदी बनी गंदा नाला
अपने उद्गम स्थल अहमदनगर से तीन किलोमीटर दूर बहेरा गांव के आगे तक सरायन नदी बिल्कुल सूखी हुई है। उसमें घास उगी हैं। इस गांव से करीब एक किलोमीटर दूरी पर बजाज हिंदुस्तान चीनी मिल का नाला नदी में गिरता है। नदी में जहां तक पानी दिखता है, इस गंदे नाले का ही पानी है जिससे नदी पूरी तरह प्रदूषित हो गई है। यह पानी पीना तो दूर सिंचाई के लायक भी नहीं है। पानी के प्रदूषित होने के कारण इसमें रहने वाले जलीय जीव भी लगभग समाप्त हो चुके हैं।
गांव में सिर्फ बचे हैं अवशेष
अहमदनगर गांव के जिस खेत से सरायन नदी प्रवाहित होती है वह कुआं तो अब नहीं है, लेकिन कुएं के स्थान पर कंकड़ मिलते हैं गांव की रम्मो ने बताया कि कुआं इन्हीं कंकड़ों का बना था। यह खेत पहले मथुरा ब्राह्मण के नाम था जो बाद में हुई चकबंदी में सुखपाल सिंह के नाम आ गया है। इस खेत को गांव के सुरेंद्र कुमार ने खरीद लिया है। इस खेत में फसल खड़ी हुई है। सुरेंद्र कुमार ने बताया कि उसने जब खेत को बराबर कराया था तब एक स्थान पर काफी मात्रा में कंकड़ निकले थे तब लोगों ने बताया कि कंकड़ों का बना हुआ कुआं उसी खेत में था। सुरेंद्र ने बताया कि कुएं से कुछ दूरी पर एक मठिया बनी हुई थी वह स्थान उसने खाली छोड़ रखा है।