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तंत्र साधना का प्रमुख केंद्र है मेढक शिव मंदिर

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लखीमपुर खीरी। हिमालय की तलहटी में बसा तराई क्षेत्र शिव उपासना का प्रमुख केंद्र रहा है। यहां कई प्राचीन और पौराणिक शिव मंदिर हैं। शहर से करीब 15 किलोमीटर दूर सीतापुर रोड पर स्थित ओयल कस्बे में बना मेढक शिव मंदिर तंत्र साधना का प्रमुख केंद्र है। यह मंदिर स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना है। मंडूक तंत्र और श्री यंत्र पर आधारित यह शिव मंदिर करीब 225 वर्ष पुराना है। ओयल स्टेट के तत्कालीन राजा बख्त सिंह ने जनकल्याण के लिए इस मंदिर का निर्माण 18वीं शताब्दी केे उत्तरार्द्ध मेें शुरू कराया था लेकिन इसे पूर्ण कराने का श्रेय उनके उत्तराधिकारी राजा अनिरुद्ध सिंह को जाता है। मंदिर का निर्माण कपिला के महान तांत्रिकों और काशी के विद्वान पंडितों की देखरेख में हुआ। इस मंदिर की एक-एक ईट मंत्र पूरित है।
करीब दो हेक्टेयर क्षेत्रफल में बना यह शिव मंदिर चारों ओर से 10 फिट ऊंची वर्गाकार चहारदीवारी से घिरा है। मंदिर का मुख्य द्वार उत्तर दिशा में है जबकि चारों दिशाओं में चार छोटे निकास द्वार हैं। मंदिर के पश्चिम में एक गुप्त द्वार भी है। परिसर में एक कुआं बना हुआ है जिसका जलस्तर हमेशा भूतल के बराबर रहता है।
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मंदिर एक विशाल मेढक की पीठ पर बना है। मेढक का मुंह उत्तर दिशा में है। पिछला हिस्सा दक्षिण दिशा में दिखाई देता है। अगले और पिछले पैर पूर्व और पश्चिम दिशा में दिखते हैं। मेढक की पीठ पर 15 फिट ऊंचा चबूतरा बनाया गया है। चबूतरे की आकृति श्री यंत्र की है। सीढ़ियों पर सहस्त्र दल कमल अंकित है। सीढ़ियां पार करने के बाद भव्य गर्भ गृह में पहुंचते हैं। गर्भ गृह में नर्मदेश्वर से लाया गया दिव्य शिवलिंग स्थापित है।
सफेद संगमरमर की जिस देवचौकी पर यह शिवलिंग स्थापित है वह भी सहस्त्र दल कमल की आकृति से अलंकृत है। मंदिर में नंदी और वीरभद्र की मूर्तियां भी स्थापित हैं। मंदिर में नंदी की खड़ी मूर्ति स्थापित है। नंदी की खड़ी प्रतिमा भी मंदिर की एक विशेषता है। आम तौर पर शिव मंदिरों में नंदी की प्रतिमा बैठी मुद्रा में होती है लेकिन यहां नंदी की प्रतिमा खड़ी मुद्रा में है। मंदिर की ऊंचाई 120 फिट है। मंदिर का शिखर गायों का झुंड, चक्र और गंगा की प्रतिमा से सुशोभित है।
मंदिर के बाहरी दीवारों पर देवताओं, ऋषियों, अप्सराओं, यति महारथियों और पशु पक्षियों की आकृतियां अंकित हैं। मंदिर परिसर के चारों कोनों पर चार अन्य मंदिर हैं। यह मंदिर दो मंजिला हैं लेकिन इनमें से किसी में भी कोई देवमूर्ति स्थापित नहीं है। मुख्य मंदिर और चारों कोनों पर बने चार मंदिर एक दरबार का दृश्य बनाते हैं। पूरा मंदिर परिसर हरे भरे पेड़ पौधों से आच्छादित है। यहां का प्राकृतिक परिवेश आध्यात्मिक शांति प्रदान करता है।
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सावन के महीने में यहां दूर-दूर से आने वाले श्रद्धालु पवित्र नदियों के जल से अभिषेक करते हैं। शिवरात्रि के मौके पर यहां विशेष तांत्रिक और धार्मिक अनुष्ठान होते हैं। मंदिर ओयल स्टेट के स्वामित्व में हैं। ओयल स्टेट के राजवंश के लोग ही इसका रखरखाव करते हैं।
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