कुशीनगर। नए वर्ष का आगाज हो गया है। तमाम ख्वाहिशों के साथ सपने संजोकर सात समुंदर पार गए लोग 2024 में मिले जख्म को भूले तो नहीं हैं, लेकिन उससे मिली चीख से सीख लेकर देश में ही आगे बढ़ने को तैयार हैं।
उनकी उम्मीदें विदेश के डॉलर, रियाल और अन्य मुद्राओं से न होकर भारतीय रुपयों से है, जिसमें गांधी विचारधारा से व्याप्त खुशी और शांति की महक है। विदेश से लौटे लोगों ने कहा कि विदेश जाने के सपने भी मजबूरी के कारण पलते-बढ़ते हैं। उससे खुशियां और उम्मीदें पूरी होने के बजाए तब टूटती हैं तो दर्द और जख्म के अलावा कुछ नहीं रह जाता।
विदेशी मुद्राओं की चमक का शिकार लोग यूं ही नहीं होते इसके पीछे रोजगार की ललक कहें या अशिक्षा और मजबूरी लोग सात समुंदर पार जोखिम में पहुंचते हैं। जल्दबाजी के चक्कर में गलत एजेंट और एजेंसियों के कारण यह गलत कंपनी के फेर में फंसकर रह जाते हैं। अधिकांश विदेश जाने में वह लोग शामिल होते हैं जो पैसे कमाने की चाहत रखते हैं। इसमें शिक्षित के साथ अशिक्षा से घिरे लोग भी शामिल हैं।
शिक्षित लोग बकायदा सारे वैध आवेदन और कंपनी के बुलावे पर जाते हैं, जबकि अशिक्षा से घिरे लोग जल्दबाजी में पहुंचने के चक्कर में चौक चौराहों पर खुली ट्रैवल एजेंसियों का शिकार हो रहे हैं। एक तरह शिक्षित लोग वहां बेहतर कमाई और जीवन से आगे बढ़ रहे होते हैं तो दूसरी तरह यह लोग फर्जी ट्रैवल एजेंसियों के चक्कर में विदेश में जाकर फंस गए रहते हैं। जहां एक तो इन्हें दबाव में काम कराया ही जाता है। दूसरी ओर इनके घर किसी के निधन पर इन्हें आने नहीं दिया जाता और वीजा छीनकर रख लिया जाता है। कई बार इन्हें भगाने के मामले भी सामने आए हैं। यही नहीं ऐसे लोग अपने घर शादी में पहुंचने की दिलासा देने के बाद भी शिरकत तक नहीं कर पाते हैं। कुशीनगर निवासी अमरजीत भी विदेश में फंसे थे। मां की मौत के बाद उन्होंने मांग की तो उन्हें प्रताड़ित भी किया गया।