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Kushinagar News: कानपुर-गोरखपुर से मिलावटी खोआ मंगा रहे धंधेबाज

Fri, 08 Aug 2025 01:50 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, कुशीनगर
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पडरौना में दुकान पर जांच करती विभाग की टीम। स्रोत- सोशल मीडिया  
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पडरौना। रक्षाबंधन पर मिठाई खरीदते समय सतर्कता बरतने की आवश्यकता है, क्योंकि त्योहार पर मिठाइयों की बढ़ी बिक्री को देखकर जिले में मिलावटखोर सक्रिय हो गए हैं। कानपुर और गोरखपुर की मंडी से मिलावटी खोआ मंगाकर बेचा जा रहा है। खाद्य विभाग की तरफ से बीते एक अप्रैल से 30 जुलाई तक खोआ के 49 नमूने एकत्र कर जांच के लिए प्रयोगशाला भेजा था, जिसमें से 24 नमूने फेल मिले हैं।
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फेल नमूनों में मिल्क फैट और मिल्क सालिड मानक के अनुसार नहीं मिली है। ये वह नमूने हैं जो हर माह मिठाई की अलग-अलग दुकानों से संदेह के आधार पर लिए गए हैं। इनसे बनीं मिठाइयां लोग बड़े चाव से खा रहे हैं, जबकि नमूनों की रिपोर्ट बता रही है कि ये सभी अधोमानक (मिलावटी) हैं।
जानकारों का कहना है कि पनीर की तरह खोआ भी पाउडर और रिफाइंड ऑयल से बनाया जा रहा है। खाद्य विभाग की टीम से बचने के लिए मिलावटखोर लंबी दूरी के बसों से आने वाले खोआ को बस स्टैंड पर बस पहुंचने से पहले कंडक्टर से बात कर उतार ले रहे हैं।
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शहर में मिठाई की लगभग 300 दुकानें हैं। खोआ से बनी मिठाई हर जगह बिकती है, लेकिन इतनी बड़ी मात्रा में इसका उत्पादन शहर में होता ही नहीं है। इसकी पूर्ति के लिए कानपुर और गोरखपुर की मंडी से बड़ी मात्रा में मिलावटी खोआ आता है। विभागीय जानकारों ने बताया कि बीते अप्रैल से जुलाई के बीच खोवा के 49 नमूने जांच के लिए भेजे गए थे, जिनमें से 24 की रिपोर्ट मानक के अनुरूप नहीं मिली है। खोआ के अधिकांश मामलों में फैट 18.9 प्रतिशत ही मिला है, जबकि उच्च श्रेणी के खोआ में फैट की मात्रा कम से कम 30 प्रतिशत होना ही चाहिए। इसके अलावा खोआ की मिली जांच रिपोर्ट में अधोमानक मिले खोआ मिल्क सालिड भी 52.56 प्रतिशत ही मिला है, जबकि खोआ में मिल्क सालिड 55 प्रतिशत से कम नहीं होना चाहिए।
जानकार बताते हैं कि खोआ बनाते समय मिलावट दूध से मलाई निकाल लेते हैं, जिसे बड़े ही आराम से 800 रुपये से 1000 रुपये में बेचकर मोटा मुनाफा कमा सकें। उधर खोवा में चिकनाहट बनी रहे इसके लिए सस्ते दर का रिफाइंड की मिलावट कर देते हैं। मिठाई के दुकानादार बताते हैं कि पहले बिहार की तरफ से शुद्ध खोआ आता था। उधर नदी के किनारे लोग पशुपालन करते थे और वहीं दूध निकालकर उससे शुद्ध खोआ तैयार करते थे। जंगल की लकड़ी की आंच पर पके दूध से तैयार खोआ की खुशबू ही उसकी असलियत की पहचान होती थी। हालांकि, वह महंगा पड़ता था। दुकानों पर बड़ी मांग और रेट की लड़ाई में कानपुर और गोरखपुर से आने वाले मिलावटी खोआ ने पूरे बाजार में कब्जा कर लिया है। पाउडर और रिफाइंड ऑयल से बना खोवा थोक मंडी के विक्रेताओं को 200 से 300 रुपये किलो के भाव मिल जाता है, जिसे वे 250 से 350 रुपये किलो मिठाई के दुकानदारों को बेच देते हैं।
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