खड्डा। गरीबी मिटाने का झांसा देने वाली माइक्रो फाइनेंस कंपनियां गरीबों को मिटाने पर ही आमादा हैं। इन कंपनियों के फैलाए कर्ज के जाल में गरीब महिलाएं फंसकर परेशान हो रहीं हैं। फंसने के बाद निकलने का कोई रास्ता नहीं दिखने पर पीड़ित या तो खुदकुशी कर रहे हैं या फिर गहना, जमीन आदि बेचकर किस्त का भुगतान कर रही हैं।
नियम व सिस्टम में हेरफेर कर कंपनियों के कार्यरत कर्मी रेवड़ी की तरह लोन बांट रहे हैं। इससे महिलाएं पहला कर्ज उतारने के चक्कर में दूसरी और फिर तीसरी कंपनी से लोन लेकर बोझ बढ़ा रही हैं। कर्ज चुकाने में पीड़ित परिवार तबाह हो जा रहा है।
माइक्रो फाइनेंस कंपनियों की ओर से ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं को ऋण देकर स्वावलंबी बनाने की महत्वाकांक्षी योजना कुशीनगर जिले में अब अपने उद्देश्य से भटक चुकी है। गरीबी में जीवन यापन कर रही महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से माइक्रो फाइनेंस (स्माॅल बैंकिंग) की परिकल्पना की गई थी। इसके तहत कुशीनगर जिले में कई कंपनियों ने अपना काम शुरू किया। इसमें महिलाओं का समूह बनाकर स्वरोजगार के लिए ऋण उपलब्ध कराया जाने लगा। धीरे-धीरे यह पूरे ग्रामीण क्षेत्रों में पैठ बना ली। एक कंपनी के शाखा प्रबंधक ने बताया कि एक आधार कार्ड व दस्तावेज पर एक ही महिला को लोन मिल सकता है। यह ऑनलाइन प्रक्रिया होती है।
अगर उस आधार कार्ड पर कहीं और लोन के लिए आवेदन किया जाता है तो सिस्टम अपने आप लॉक कर देगा। लेकिन, बड़ी संख्या में दो से 10 से अधिक कंपनियों ने कई महिलाओं को लोन दे रखा है। सूत्रों की मानें तो फाइनेंस कंपनी के कुछ कर्मचारी अपने अधिकारियों के इशारे पर कंप्यूटर में हेरफेर कर बैंक कर्ज शून्य दिखा दे रहे हैं।
इसके एवज में वह कर्ज लेने वालों से रिश्वत की वसूली करने के बाद दूसरे बैंक से लोन दिला देते हैं। इसके पीछे खेल यह हो रहा है कि दूसरे जगह से मिले रुपये से पहले वाले लोन का भुगतान जमा कराया जा रहा है। एक कर्ज लेकर दूसरे का कर्ज भरने के कारण भी कई महिलाएं इस दलदल में फंस गईं हैं।
भुगतान के लिए दबाव बनाते हैं कर्मी : समूह का कर्ज लोगों की जिंदगी पर भारी पड़ रहा है। किस्त देने की तिथि पर लोग रुपये के लिए घर का चूल्हा, गैस सिलेंडर तक बंधक रखने को मजबूर हो जाते हैं।
लोगों का कहना है कि समूह का कर्ज देने वाले कर्मचारी लोन लेने वाले की हैसियत नहीं देखते हैं। वह दिया गया रुपया लौट पाएगा या नहीं, इसको देखते बिना वह कर्ज दे देते हैं। अगर किस्त समय पर नहीं दिया तो ब्याज बढ़ा दिया जाता है। इसके बाद कर्मचारी दबाव बनाना शुरू कर देते हैं। यही नहीं, कई बार तो मारपीट पर भी कर्मी आमादा हो जाते हैं।