फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Kushinagar News: गंडक की धारा के साथ आ रहा भारत-नेपाल का साझा दुख... छलक आईं आंखें

विज्ञापन
दुदही क्षेत्र के अमावाखास तटबंध पर गंडक का बहाव देखते गांव के लोग। संवाद
विज्ञापन
कुशीनगर। नेपाल में त्रासदी आती है तो उसका असर केवल नेपाल तक सीमित नहीं रहता है। पहाड़ों पर बारिश का पानी नीचे उतरता है। नदियां उफनाती हैं और देखते ही देखते उसका असर यूपी के महराजगंज, कुशीनगर होते बिहार के सीमावर्ती इलाकों तक पहुंच जाता है। इस बार भी यही हुआ। भोटेकोशी नदी से गंडक नदी केवल पानी नहीं लाई, नेपाल में बिछड़े परिवारों का शोक भी धारा में बहता हुआ कुशीनगर तक पहुंचा है। यही वह दृश्य है, जहां भारत-नेपाल का संबंध किसी राजनयिक दस्तावेज या सरकारी बयान से अधिक जीवंत और मानवीय दिखाई देता है। नदी के किनारे रहने वाले लोगों की नदियों में बहती लाशों को देख आंखें नम हो जा जा रही हैं।
विज्ञापन

नेपाल में भीषण त्रासदी के बाद दिल्ली ने जिस तत्परता के साथ सहायता का हाथ बढ़ाया, उसने दुनिया को दोनों देशों की निकटता का चेहरा दिखा दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेपाल के प्रधानमंत्री से बात कर हर संभव मानवीय सहायता का भरोसा दिया और राहत सामग्री की खेप भेजनी शुरू कर दी। इस रिश्ते का दूसरा और शायद अधिक गहरा चेहरा नारायणी नदी (गंडक) के किनारे दिखाई देता है, जहां नदी के साथ भारत की धरती तक नेपाल की त्रासदी पहुंची और बिछड़े लोगों की तलाश का एक सिरा महराजगंज और कुशीनगर में आकर जुड़ गया।
महराजगंज और कुशीनगर में गंडक से मिले शव इस त्रासदी की सबसे मार्मिक तस्वीर हैं। भले ही रिपोर्ट में वे संख्या हैं लेकिन हर संख्या के पीछे एक पूरा परिवार है। किसी मां की प्रतीक्षा, किसी पत्नी की उम्मीद, किसी बच्चे का सवाल और किसी घर की वह खामोशी, जिसे शब्दों में बयान करना मुश्किल है। नेपाल में जिस व्यक्ति को उसके अपने तलाश रहे हैं, उसकी अंतिम निशानी जब भारत की नदी के किनारे मिलती है, तो सीमा की सारी औपचारिकताएं छोटी पड़ जाती हैं।
विज्ञापन

वहां कोई विदेशी नहीं रहता, कोई पराया नहीं रहता, वहां सिर्फ एक मनुष्य रहता है, जिसे उसके परिवार तक पहुंचाने की कोशिश दूसरे देश की धरती पर शासन प्रशासन की ओर से होती है। यही भारत-नेपाल संबंध की सबसे सच्ची तस्वीर है। भारत और नेपाल के बीच खुली सीमा इस रिश्ते को और विशिष्ट बनाती है। नरवाजोत बंधे के किनारे बसे गांव पिपराघाट निवासी कैलाश सिंह, राजू चौहान, रामप्रताप सिंह, अहिरौलीदान गांव के पप्पू सिंह, डॉ. ब्रह्म शर्मा, नीरज सिंह, बाघाचौर निवासी पप्पू यादव से शनिवार की दोपहर करीब दो बजे बंधे पर मौजूद लोगों से नेपाल में त्रासदी और नदी में बहते शवों की चर्चा की गई तो इन लोगों की आंखें भर आई। इन लोगों का कहना था कि आधे से अधिक उम्र गुजर गए लेकिन नारायणी में इस तरह की लाशों और घर गृहस्थी के सामानों को बहता हुआ नहीं देखा था, यह देख मन बहुत दुखी है।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें