उजारनाथ। चंद्रौटा गांव में श्रीमद्भागवत कथा के दूसरे दिन रविवार की शाम कथा वाचक ने राजा परीक्षित की प्रसंग व शुकदेव के आगमन सहित भगवान के वाराह अवतार की कथा सुनाई। कहा कि प्रभु का स्मरण मृत्यु के भव को मिटाता है। लोगों को हर समय भगवान का भजन करते रहना चाहिए।
कथा वाचक जगद्गुरु स्वामी राघवाचार्य ने कहा कि महाभारत युद्ध में कौरव सेना के पराजय से क्रोधित होकर अश्वत्थामा ने पांडवों को मारने के लिए ब्रह्मास्त्र चलाया। ब्रह्मास्त्र से भगवान श्रीकृष्ण ने अभिमन्यु की पत्नी उतरा की गर्भ की रक्षा की। उसके बाद परीक्षित का जन्म हुआ। राजा परीक्षित बड़े होकर प्रतापी राजा बने। एक दिन परीक्षित शिकार करते हुए प्यास लगने पर वन में शमिक ऋषि के आश्रम में पहुंचे। मुनि समाधि में थे। इसलिए राजा के मांगने पर भी जल नहीं दिया। राजा के मुकुट में बैठे कलियुग ने उनकी बुद्धि भ्रष्ट कर दी और राजा ने क्रोध में आकर मरा हुआ सांप मुनि के गले में डाल दिया। जब मुनि के पुत्र शृंगी को यह बात पता चली, तो उन्होंने क्रोधित होकर शाप दिया कि सातवें दिन तक्षक नाग राजा को डस लेगा। राजा परीक्षित मृत्यु के भय से मुक्त होने के लिए मुनियों ऋषियों से मोक्ष का मार्ग पूछा। ऋषि शुकदेव मुनि ने सात दिनों तक भगवान श्रीकृष्ण की पावन कथा सुनाई। कथा के माध्यम से शुकदेव ने कहा कि जीव अमर है। प्रभु स्मरण ही मृत्यु के भय को मिटाता है।
इस दौरान वेद प्रकाश मिश्र, डाॅ. दिलीप मणि त्रिपाठी, राधेश्याम पांडेय, थानाध्यक्ष आलोक यादव, डाॅ. संजय मणि त्रिपाठी, सुधाकर मिश्र आदि मौजूद रहे।