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Kushinagar News: मौत की धारा के बीच लकड़ी का मोह

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खड्डा/गुरवलिया बाजार। नेपाल से निकलकर भारत में प्रवेश करने वाली गंडक महराजगंज से होते हुए कुशीनगर के खड्डा-दुदही और तमकुहीराज क्षेत्र के आसपास बहती हुई बिहार के पश्चिम चंपारण की ओर बढ़ती है। पश्चिम चंपारण के धनहा-रतवल के पास नदी पर बना पुल उत्तर प्रदेश और पश्चिम चंपारण के बीच महत्वपूर्ण संपर्क कड़ी है। गंडक की तेज धारा के बीच कुछ स्थानीय लोग जान जोखिम में डालकर बहकर आई लकड़ियां निकालते दिखे।
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ग्रामीणों का कहना है कि नेपाल की ओर से इस बार इतनी बड़ी मात्रा में लकड़ी बहकर आई है कि उन्होंने पहले कभी ऐसा मंजर नहीं देखा।नदी में बहकर आई लकड़ियों में कई बड़े और पुराने तने भी हैं। कुछ लकड़ियां किनारे और सिल्ट में फंसी हैं तो कई अभी भी पानी के साथ बह रही हैं। ग्रामीण इन्हें बेशकीमती बता रहे हैं और मौका मिलते ही नदी की धार से निकालने की कोशिश कर रहे हैं।लेकिन नदी की तेज धार के बीच लकड़ी निकालना जानलेवा भी साबित हो सकता है। शव और अन्य मलबे के साथ लकड़ियों का बहकर आना इस बात का संकेत है कि नेपाल के पहाड़ी इलाकों में बाढ़ ने रास्ते में मौजूद पेड़ों और दूसरी प्राकृतिक सामग्री को भी उखाड़ दिया।एक तरफ प्रशासन नदी में जिंदगी और मौत के निशान तलाश रहा है, दूसरी तरफ कुछ लोग उसी धारा में रोजी-रोटी की तलाश कर रहे हैं।
लकड़ियों पर बने निशान बता रहे त्रासदी की दास्तां
गंडक के किनारे पहुंची लकड़ियां सिर्फ बाढ़ के साथ आया मलबा नहीं लगतीं। कई लकड़ियों पर गहरे कटाव और चोट के निशान दिखाई दे रहे हैं। ग्रामीणों के मुताबिक लकड़ियां काफी पुरानी और भारी हैं। उनके तनों पर बने निशान बताते हैं कि तेज बहाव में इन्हें रास्ते में पहाड़ी चट्टानों और दूसरे पत्थरों से कई बार टकराना पड़ा होगा। बाढ़ का पानी जब पहाड़ी रास्तों से नीचे उतरता है तो अपने साथ पेड़, चट्टान, मिट्टी और रास्ते में आने वाली दूसरी वस्तुएं बहा ले जाता है। लगातार टकराव और घर्षण से लकड़ियों पर बने निशान उसी सफर की कहानी कहते हैं और देखने में लगता है कि ये निशान सिर्फ लकड़ी पर नहीं हैं इनमें उस जलप्रलय का रास्ता दर्ज है, जिसने नेपाल में घरों और परिवारों को उजाड़ दिया और उसका मलबा अब गंडक के किनारे तक पहुंचा दिया।
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