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सहे फिरंगियों के सितम, फिर भी नहीं बना स्मारक स्थल

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सहे फिरंगियों के सितम, फिर भी नहीं बना स्मारक स्थल
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सेनानियों का गांव किशुनदेव पट्टी पहचान को मोहताज
जिन्होंने दी कुर्बानी, उन शहीदों की यादें भी संजोने को गंभीर नहीं
गुरवलिया बाजार(कुशीनगर)। स्वाधीनता संग्राम में जान न्यौछावर करने वाले अमर शहीदों को अब तक एक अदद स्मारक भी नसीब नहीं हो सका है। सरकार भले ही आजादी के 75वें वर्षगांठ पर अमृत महोत्सव मना रही हो, लेकिन तमकुही क्षेत्र के एक ही गांव के तीन सेनानियों का न तो स्मारक स्थल बना, न उनकी यादों को संजोने के लिए संजीदगी दिखी।
तमकुही विकास खंड के ग्राम पंचायत देवपोखर के टोला किशुनदेव पट्टी शासन-प्रशासन के गुमनामी व उपेक्षा की चादर ओढ़े है। 1915 को एक साधारण परिवार में जन्मे दीपराज सिंह ने बगावती तेवर से अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिए थे। फैजाबाद के अकबरपुर में महात्मा गांधी से प्रेरित होकर इन्होंने अपनी टीम के साथ रेलवे लाइन तोड़ी थी। खादी आश्रम का खजाना लेकर घर आ गए और गांव के खेत में महीनों तक छिपे रहने के बाद सामान्य माहौल होने पर उत्तर प्रदेश के खादी संस्थापक जेपी कृपलानी को सारा धन वापस कर दिया। उनकी ईमानदारी से प्रभावित जेपी कृपलानी ने इन्हें क्षेत्रीय गांधी आश्रम मेरठ का मंत्री बना दिया। बताया जाता है कि उनकी आवाज को दबाने के लिए छह अक्तूबर 1975 को दीपराज सिंह की हत्या कर दी गई थी।
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इसी गांव के दीपराज सिंह के भाई 1918 को जन्मे हरिनंदन सिंह भी आक्रमक तेवर के कारण स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े। चूंकि अंग्रेजी जमाने में खादी का अमूल्य योगदान था, अंग्रेजों के दमनकारी रवैये को धाराशायी करने के लिए मंत्री दीपराज सिंह ने एक टीम बनाई थी। ये भी उसके अहम सदस्य थे। बाद में इनको उत्तर प्रदेश का ऑडिटर बना दिया गया। तब से देश के लिए संघर्ष करते रहे। 1990 में हरिनंदन सिंह का निधन हो गया।
इसी गांव के 1918 को एक मध्यवर्गीय परिवार में जन्मे महामुनि राय भी कम नहीं थे। उन्होंने प्रदेश के विभिन्न जगहों पर आंदोलनों में शिरकत की। महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन का हिस्सा भी रहे। साथ ही प्रेरित होकर बागपत में गांधी आश्रम में रहकर ‘स्वदेशी अपनाओ, विदेशी भगाओ’ का नारा बुलंद किया। अंग्रेजों ने इन्हें बहुत मारा पीटा, प्रताड़ित किया। महात्मा गांधी के आह्वान पर इन्होंने देश के लिए सर्वस्व न्यौछावर करने को ठान ली थी। महामुनि राय का 3 सितंबर 2006 में निधन हो गया। उनके बेटे भी देश सेवा में लगे हैं। चार बेटों में दो बेटे क्रमश: दिलीप राय व सतीश राय उपनिरीक्षक व हेड कांस्टेबल हैं। वहीं दो बेटे क्रमश: योगेंद्र राय व रवि राय किसान व अध्यापक हैं।
न ही मूर्ति न ही स्मृति द्वार, उपेक्षा का शिकार
किशुनदेवपट्टी में सेनानियों के परिवार में दुख है। गांव में तीन सेनानियों के होने के बावजूद प्रतिमा तक की स्थापना नहीं हुई है। उनकी स्मृति को संजोने के लिए अधिकारी तक संजीदा नहीं है। केवल इतिहास के पन्ने में सेनानियों की यादें दबकर रह गई हैं। आगामी युवा पीढ़ी इनके त्याग, बलिदान व देशप्रेम से कैसे रूबरू होगी।
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डीएम से की मांग, नहीं हुआ समाधान
महामुनि राय की पत्नी किशोरा ने बताया कि स्वतंत्रता व गणतंत्र दिवस पर पूर्व में कई बार जिलाधिकारी से पति के स्मृति स्थल, स्मृति द्वार व दरवाजे पर हैंडपंप के लिए मांगपत्र सौंप चुकी हूं। मौखिक भी कह चुकी हूं, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई।
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