पडरौना। तस्करों से मुठभेड़, सीमावर्ती इलाकों में नाकाबंदी, तस्करी के लिए बदनाम हो चुके गांव में स्थलीय सत्यापन, गैंगस्टर, गुंडा और संपत्ति कुर्क की कार्रवाई कर पुलिस भले ही सुर्खियों में बने रहने के लिए पैंतरे आजमाती रहती है। तस्करों और खाकी के बीच कानूनी जंग में पुलिस कार्रवाई कर वाहवाही लूटने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रही है।
हकीकत में पशु तस्कर इस पूरे अवैध धंधे में अपने तरकीब और विभागीय ‘’जयचंद’’ की मदद से पुलिस से चार कदम आगे हैं। सूत्रों की मानें तो खाकी भी इनकी साथी बनी हुई है जो कभी बैक सपोर्ट कर देती है तो कभी पशुओं से भरी खेप को इधर-उधर करने में अहम भूमिका में रहती है। खाकी के तस्करों से साथी बनने के पीछे की वजह कई हैं जो पिछले दिनों में ऐसी घटनाएं भी इस बात को बल दे रही हैं।
जिले के रास्ते बिहार में होने वाली पशु तस्करी के खेल पर लगाम लगाने में एसपी कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है। इसके लिए स्पेशल टारगेट तैयार की है, लेकिन विभागीय जयचंद पशु तस्करी के इस खेल में विभागीय गोपनीयता भंग कर मदद कर रहे हैं। पश्चिमी, यूपी के अलावा पूर्वांचल और बिहार वाया बंगाल तक के पशु तस्करों के नेटवर्क कोे तोड़ने के लिए अभी भी पुलिस काम कर रही है। तस्करी के माध्यम बने पिकअप, कुख्यात तस्करों की तलाश, पिछले पांच वर्षों में जेल से बाहर आए अपराधियों की वर्तमान गतिविधि पर पुलिस नजर बनाए हुए है, लेकिन के इस पूरे अभियान से तस्कर चार कदम आगे निकल गए हैं। तस्करों ने पिकअप से नंबर प्लेट हटाकर ही तस्करी को अंजाम देना शुरू किया।
इस पूरे अवैध धंधे को अंजाम देने का समय धुंध और सुबह को चुना, जब पुलिस गहरी नींद में सो रही होती है। सूत्रों के अनुसार एसपी के अभियान को उनके ही जयचंद फीका कर रहे हैं, क्योंकि इनके सहारे ही सूचनाएं लीक हो जाती हैं। वहीं हाईवे से हो रही तस्करी में एनएच से जुड़े थाने और चौकियों के सिपाहियों की भूमिका संदिग्ध रहती है। पिछले दिनों पटहेरवा, चौराखास, तरयासुजान, तुर्कपट्टी आदि थानों से जुड़े सिपाहियों की भूमिका पुलिस कप्तान के अभियान पर पलीता लगाता दिखा है। यही नहीं एक सिपाही को कुचलकर मार देने के बाद पुलिस इन तस्करों से टकराने से भी डरती है।
बिना खाकी के साथी बने तस्करी मुश्किल...आ चुका है नाम : खाकी जैसी शान-ओ-शौकत के बल पर अर्जित धन से कुछ चेहरों का मन नहीं भरता तो अवैध कार्यों में सहयोग से धन कमाने का सपना पाल लेते हैं। इसके लिए उनकी पसंद में कई छोर पर बिहार से जुड़े मालदार और हाईवे से जुड़े थाने रहते है, जहां से वह गाड़ियों को बिहार में दाखिल कराकर रकम ऐंठते हैं। जिले की पुलिस कई दफा तस्करों के साथी की भूमिका निभाती है। पिछले दिनों कुछ सिपाहियों का नाम तस्करी में सहयोग देने वालों की फेहरिस्त में था। बाद में हुई जांच में पता चला था कि शुरू से ही हाईवे के थानों की उनकी चाह रही थी। सूत्रों के मुताबिक रकम लेकर न केवल तस्करों के गाड़ियों को सीमा पार कराया जाता है, बल्कि यह गाड़ी के आगे-आगे पथ प्रदर्शक की भूमिका का भी यह निर्वहन करते हैं।