कुशीनगर। ककुत्था नदी का पुरैनाघाट विकसित होने के बाद बौद्ध पर्यटकों को लुभाएगा। महापरिनिर्वाण स्थली कुशीनगर को नई पहचान दिलाने के साथ बुद्ध के जीवन संबंधी घटनाओं को भी सेतु की तरह जोड़ेगा।
मूर्त रूप लेने से स्थल की सूरत बदलेगी, तो बौद्ध धर्मावलंबियों का इस स्थल दर्शन को झुकाव भी बढ़ेगा। पुरैना घाट पर आरसीसी सीढि़यां बनाने के बाद ऊपर संगमरमर का इस्तेमाल किया जाएगा।
वहीं, अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस शौचालय, मौसम से बचाव के लिए शेड और आने वाले पर्यटकों के बैठने के लिए बेंच की व्यवस्था भी की जाएगी।
वर्तमान में पुरैनाघाट कुलकुला देवी स्थल से पूरब रहसू जनूबी पट्टी गांव के पास से गुजर रही ककुत्था नदी पर पवित्र व पूजनीय बौद्ध स्थल है। बौद्ध मामलों के जानकारों के अनुसार महात्मा बुद्ध का कुशीनगर पहुंचने व महापरिनिर्वाण प्राप्ति से पूर्व का उनका अपने शिष्यों के साथ का अंतिम ठहराव स्थल था। यह वही स्थान है, जहां उन्होंने निर्वाण से पहले अंतिम बार ककुत्था नदी के जल को पीया था और अंतिम स्नान भी किया था। बौद्ध धर्मावलंबियों का कहना है कि ककुत्था का जल में वह दिव्य ऊर्जा थी, जिसे ग्रहण वह आठ किलोमीटर पदयात्रा कर कुशीनगर (प्राचीन कुशीनारा व कुसावती) पहुंचे। जहां उन्होंने 80 वर्ष की अवस्था में महापरिनिर्वाण को प्राप्त किया था।
जिन प्रमुख स्थलों से होकर कुशीनगर बुद्ध पहुंचे, उस बुद्ध गमन मार्ग पर ककुत्था नदी के पुरैना घाट से पूर्व वर्तमान में बदुरांव (प्राचीन भोग नगर), फरेंदहा (चुंद स्थल भारतीरा), वीरभारी टीला उस्मानपुर (प्राचीन पावानगर), सुमहीं टीला, बेईली ताल, धनहां से पुरैना घाट व वहां से कुशीनगर पहुंचे थे। 18 से 20 एकड़ में वीरभारी टीला फैला हुआ है।