संवाद न्यूज एजेंसी
पडरौना/ सुकरौली। कुम्हार की चाक दुनिया की चकाचौंध में भले ही धीमी हो गई थी, मगर जब दीपोत्सव की बात हो तो मिट्टी के दीपों का महत्व बढ़ जाता है।
इस पर्व पर मिट्टी के दीपों की मांग को देखते हुए कुम्हार जोरशोर से दीपक बनाने में जुटे हैं। आज भले ही बाजार में तरह-तरह के फैंसी दीये आ गए हों, मगर मिट्टी के दीपों का महत्व कम नहीं हुआ है। हर शुभ काम में इनका प्रयोग होता है। पिछले साल की अपेक्षा इस बार दिवाली पर मिट्टी के दिये की मांग अधिक है।
सुकरौली विकास खंड में मिश्रोली में कुम्हारों के लगभग 50 परिवार रहते हैं। इसके अलावा सुकरौली, सेमरी,पटनी, ठुठी, चिलुवां में भी कुम्हार रहते हैं, जो मजदूरी करके जीवन यापन करते हैं।
उनमें से कुछ गिने-चुने परिवार हैं जो अब तक इस पेशे से जुड़े हैं, जबकि अन्य मजदूरी या अन्य कार्य कर परिवार का भरण-पोषण कर रहे हैं। मिट्टी के बर्तन बनाने वाले लोग त्योहार के अलावा अन्य दिनों में आसपास के इलाकों में मजदूरी कर जीपन यापन करते हैं। करीब एक दशक से ज्यादातर परिवार यह कारोबार छोड़ चुका था, लेकिन अब दीपक का मांग बढ़ने से ज्यादातर पुश्तैनी पेशा छोड़ चुके लोगों ने फिर से अपनी चाक पर कार्य करना शुरू कर दिया है।
शत्रुध्न, कमलेश, रिंकू, सूरज, दिवाकर आदि का कहना है कि अब इस काम में कुछ बचा नहीं। इस कारण लोग इसे छोड़ रहे हैं। दीपावली या अन्य अवसर पर अब मिट्टी की दीपों की मांग रहती है, लेकिन पिछले साल राम मंदिर के निर्माण पर पहले दिन सभी लोग मिट्टी के दीपों को जलाकर दीपावली मनाने की तैयारी करते थे, तभी से दीयों का मांग बढ़ रही है। यदि ऐसे ही फिर से स्वदेशी सामानों की मांग बढ़ने लगे तो हो सकता है कुछ लोग इस पेशे में फिर से आ जाएं।