संवाद न्यूज एजेंसी
पडरौना। बाजार में मिल रही सस्ती मिठाई कहीं आपको बीमार न कर दे। मिठाइयों में बड़े पैमानी पर मिलावट कर छेना और चावल से बनी रंग बिरंगी बूंदी से लड्डू बनाए जा रहे हैं। जिसे देखने में कहीं से मिलावट नजर नहीं आएगी।
बाजार में मिलावटी छेना करीब 200 रुपये किलो और 100 रुपये किलो लड्डू मिल जाएगा, लेकिन उसका सेवन करने के बाद आप बीमार हो सकते हैं। ऐसे में लोगों को त्योहार पर मिठाई खरीदते समय बेहद सावधानी बरतने की जरूरत है। खाद्य विभाग के जांच अभियान में शनिवार को एक दुकान से 85 किलोग्राम दूषित खोया मिला था, जिसे टीम ने गंभीरता से लेते हुए नष्ट करा दिया।
दिवाली समेत अन्य पर्वों पर मिठाइयों की मांग बढ़ जाती है। मिठाई के कारोबारी उनके यहां की मिठाइयों को शत प्रतिशत शुद्ध बताते हैं। ऐसे में छेना के शौकीनों को त्योहारों पर मिठाई खरीदते समय सावधानी बरतने की जरूरत है। लोगों को पता है कि छेना की मिठाई बनाने में व्यापारियों को बड़ी मेहनत करनी पड़ती है, लेकिन वास्तविकता कुछ और ही है। बिहार और बंगाल से आए मिठाई बनाने वाले कारीगर केमिकल युक्त छेना पाउडर, सोयाबीन का पाउडर, सुधनी, रिफाइंड ऑयल, सस्ता वनस्पति घी या सूजी मिलाकर कुछ ही देर में छेना रसगुल्ला बना देते हैं। शहर के तमाम छोटे दुकानदार और ठेले वाले इस छेने को महज डेढ़ सौ रुपये किलो खरीदकर 200 से 250 रुपये किलो बेच दे रहे हैं।
सस्ते के चक्कर में ऐसी दुकानों पर लोग खरीदारी भी कर ले रहे हैं। ऐसी मिलावटी मिठाई सेहत के लिए ठीक नहीं है। खाद्य विभाग के अधिकारियों की सलाह है कि सस्ती मिठाई के चक्कर में न फंसे। मिठाई खरीदते समय जांच-परखकर लें। पडरौना नगर के सुभाष चौक, जटहां रोड, मंसाछापर रोड, बावली चौक, कसया के गांधी चौक, मेन बाजार, ओवरब्रिज के पास लगे ठेले समेत जिले के अन्य कस्बे और ग्रामीण इलाकों की दुकान और ठेलों पर इस तरह की मिठाइयां बिक रही हैं। इसको लेने के लिए यदि कोई ग्राहक मूल्य पूछता है तो अलग-अलग स्थानों के दुकानदार पहले तो छेना मिठाई की कीमत 220 से 250 रुपये प्रति किलो बताते हैं, लेकिन यदि ग्राहक मोलभाव करता है तो उसे 200 रुपये किलो देते हैं।
यही हाल रसगुल्ला, गुलाब जामुन, मिल्क केक आदि मिठाइयों का भी है। इन स्थानों पर बिक रहीं मिठाइयों को कारीगर वहीं नहीं बनाते, बल्कि वे दुकान पर रेडीमेड ही आती है। इसे बनाने वाले कारीगर बिहार और बंगाल से आए हैं। वे शहर के कुछ दूर अथवा आसपास गांवों में किराए के कमरों में डेरा डाले हुए हैं।