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बोध आते ही क्रोध और विरोध दोनों ही हो जाते हैं समाप्त : मोरारी बापू

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कुशीनगर : रामकथा सुनाते कथा व्यास मुरोरी बापू। संवाद न्यूज एजेंसी। - फोटो : KUSHINAGAR
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बोध आते ही क्रोध और विरोध दोनों ही हो जाते हैं समाप्त : मोरारी बापू
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रामकथा का सातवां दिन, कथावाचक बोले- हमारी समझ जीवित हो जाए तो सभी सांसारिक कष्टों से मुक्ति मिल जाए
अमर उजाला ब्यूरो
कसया (कुशीनगर)। ज्ञान और बोध में अंतर है। ज्ञान होने पर व्यक्ति में क्रोध हो सकता है जैसे-परशुराम। बोध होने पर व्यक्ति में क्रोध नहीं हो सकता जैसे-महात्मा बुद्ध। अतिक्रोध शव का परिचायक है। बोध आते ही क्रोध और विरोध दोनों ही समाप्त हो जाते हैं। जहां घर्षण होता है वहां अग्नि पैदा होती है। घर्षण से चंदन की लकड़ी में भी आग लग जाती है।
यह कहना है विख्यात कथा वाचक संत मोरारी बापू का। कुशीनगर में रामकथा के सातवें दिन शुक्रवार को मानस निर्वाण की व्याख्या के दौरान कथा व्यास ने एक भक्त की चिट्ठी का जिक्र करते हुए कहा कि उनसे पूछा गया कि क्या भगवान बुद्ध ने कभी क्रोध किया था। इसका जवाब देते हुए मोरारी बापू ने कहा कि जिसे बोध हो गया वह क्रोध कर ही नहीं सकता। बोध होते ही क्रोध और विरोध हृदय से बाहर निकल जाते हैं। महर्षि लोमस और काग भुसुंडी की कथा का जिक्र करते हुए कहा कि काग भुसुंडी ने महर्षि लोमस से राम चरण के दर्शन की इच्छा जताई। महर्षि लोमस निराकार ब्रह्म की भक्ति करते थे। नाराज महर्षि लोमस से काग भुसुंडी को श्राप दे दिया। काग भुसुंडी ने तो काग रूप में भी भगवान के दर्शन प्राप्त कर लिए, लेकिन क्रोधवश महर्षि लोमस को यह फल नहीं मिला। भगवान बुद्ध अपने 10 हजार शिष्यों से बात करते थे। इसका अर्थ यह नहीं कि प्रत्येक भक्त से अलग-अलग कक्ष में मिलते होंगे बल्कि जो लोग भगवान बुद्ध की शरण में गए होंगे उन्हें भगवान द्वारा कही बातों को समझने का अवसर मिला होगा। व्यक्ति जब भगवान की भक्ति में लीन होता है तो उसके गुण, उपदेश, आदर्श को अंत:करण में महसूस करने लगता है। जब भी भक्त को जरूरत होती है तो भगवान किसी न किसी रूप में जरूर उसके सामने उपस्थित होते हैं। यह युगे-युगे नहीं, क्षणे-क्षणे, दिने-दिने भी हो सकता है। एक व्यक्ति ने पूछा कि इस धरती पर न तो बोधि वृक्ष है और न ही आनंद तो भगवान बुद्ध यहां दोबारा कैसे आएंगे। इसका जवाब देते हुए मोरारी बापू ने कहा कि जिस वृक्ष के नीचे भगवान बुद्ध बैठ जाएं वही वृक्ष बोधि वृक्ष हो जाएगा। अगर भगवान बुद्ध आए तो आनंद तो आएगा ही।
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अपनी बात को और स्पष्ट करते हुए कथा वाचक ने भिक्षुणी गौतमी की कथा सुनाते हुए कहा कि गौतमी के पति की मौत हो चुकी थी। गोद में एक छोटा बच्चा था। कुछ दिन बाद बच्चे की भी मौत हो गई। गौतमी बच्चे का शव गोद में लिए भगवान बुद्ध की शरण में गई और बच्चे को जीवित करने की प्रार्थना की। भगवान बुद्ध ने कहा कि वह नगर के किसी ऐसे घर जहां अब तक किसी की मौत न हुई हो वहां से सरसों का चार दाने मांगकर ले आओ। गौतमी बच्चे को वहीं छोड़कर नगर में पहुंची और एक-एक घर घूमी लेकिन कोई ऐसा घर नहीं मिला जिसमें कभी किसी की मृत्यु न हुई है। वहां से वापस लौटकर भिक्षुणी गौतम ने महात्मा बुद्ध से कहा कि बेटा जीवित हो न हो, उसकी समझ जीवित हो गई। अगर हमारी समझ जीवित हो जाए तो सभी सांसारिक कष्टों से मुक्ति मिल जाए और यही समझ ही निर्वाण का मार्ग प्रशस्त करेगा।
सातवें दिन की रामकथा में आयोजक अमर तुलस्यान, विक्रम अग्रवाल, सुधीर वर्मा, गौरव बथवाल, प्रांजल तुलस्यान, अखिलेश खेमका, कृष्णा जायसवाल, प्रेमानंद, सुमित त्रिपाठी, शैलेंद्र दत्त शुक्ल, मार्कंडेय शाही आदि मौजूद रहे।
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जो तपस्या करेगा, उसे वरदान मिलेगा
कसया। नौ दिवसीय रामकथा के दौरान भगवान के प्राकट्य की चर्चा करते हुए मानस मर्मज्ञ मोरारी बापू ने कहा कि जब धरती पर रावण के अत्याचार से ऋषि, मुनियों के अलावा स्वयं पृथ्वी भी त्रस्त हो गई तो सभी लोग ब्रह्मा जी के पास पहुंचे। वहां ब्रह्मा जी से कहा गया कि ऐसा वरदान क्यों दिया जाता है जिससे कि प्रकृति का नियम भी संकट में पड़ जाता है। इसका जवाब देते हुए ब्रह्मा जी ने कहा कि कर्म का फल अवश्य मिलता है। अगर कोई तपस्या करेगा तो उसे वरदान भी मिलेगा। लेकिन जब ब्राह्मण, गाय, देवता और संतों पर अत्याचार होता है तो जगत के कल्याण के लिए स्वयं भगवान धरती पर अवतार लेते हैं।
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