अर्थदंड नहीं दिया तो काटनी पड़ी थी जेल
स्वतंत्रता सेनानी राजाराम लाल को भूल गया शासन-प्रशासन
नित्यानंद पांडेय
गुरवलिया बाजार। आजादी की लड़ाई में हर मोर्चे पर आगे रहने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी राजाराम लाल श्रीवास्तव का पैतृक गांव श्रीरामपट्टी विकास के लिए तरस रहा है। उनकी प्रतिमा की साफ-सफाई भी नहीं कराई जाती है। देश की आजादी में संघर्ष व अविस्मरणीय योगदान देने वाले को लोग भूल गए हैं।
फाजिलनगर क्षेत्र के ग्राम श्रीरामपट्टी गांव में एक जून 1917 को जन्मे राजाराम लाल श्रीवास्तव का देश की आजादी में योगदान रहा है। गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि राजाराम ने आजादी की लड़ाई में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। उनके परिजनों ने खुद ही उनकी पुण्यतिथि पर स्मृति स्थल का निर्माण कराया। जेल भरो आंदोलन में अंग्रेजी हुकूमत ने उन्हें वर्ष 1941 में एक वर्ष का कठोर कारावास और 50 रुपये अर्थदंड की सजा सुनाया था। अर्थदंड नहीं देने पर छह माह की अतिरिक्त सजा लखनऊ जेल में काटनी पड़ी थी। 24 दिसंबर 2018 को राजाराम लाल श्रीवास्तव ने अंतिम सांस ली थी। परिजन बताते हैं कि स्वतंत्रता संग्राम सेनानी राजाराम लाल श्रीवास्तव की याद में यहां कोई स्मृति स्थल नहीं है। राजाराम के चार बेटे अरुण प्रकाश, दिनेश, आनंद और मनोज श्रीवास्तव हैं। वह लोग बताते हैं कि पिताजी में बारे में बहुत कुछ सुन रखा है। बताया कि अब लोगों में आजादी के दीवानों व उनके परिवार के लिए दिल में कोई जगह नहीं दिखाई देती है। संवाद
परिजनों ने लगवाई प्रतिमा
स्वर्गीय राजाराम श्रीवास्तव की बहू निर्मला देवी ने बताया कि गांव में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के नाम पर कुछ भी नहीं है। कुछ दिन पहले परिवार के लोगों ने बाबूजी की प्रतिमा लगवाई थी। गांव में सड़क तो बनी है, लेकिन देखरेख नहीं होने के कारण काफी बदहाल है। अमित कहते हैं कि पहले के लोग देश के लिए जान न्योछावर करते थे। तब 15 अगस्त को लोग देशभक्ति से ओतप्रोत हो जाते थे। जमाना बदला तो लोगों की सोच बदलती गई। अब चाहे नेता हो या अधिकारी सभी रणबांकुरों को भूल गए हैं।