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Kushinagar News: चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग में हाथी पर सवार होकर आज पधारेंगी मां दुर्गा

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- आज से नौ दिनों तक होगी शक्ति की अराधना, कलश स्थापना के लिए 47 मिनट का योग
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- 19 को श्री दुर्गाष्टमी, 20 अक्तूबर को महानवमी और इसी दिन विजयादशमी का पर्व मनाया जाएगा

पडरौना। मां भगवती की आराधना का पावन पर्व शारदीय नवरात्र इस बार भक्तों के लिए विशेष धार्मिक संयोग लेकर आ रहा है। रविवार से नवरात्र का शुभारंभ हो रहा है। मां दुर्गा हाथी पर सवार होकर चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग में आएंगी। गज को वर्षा, अन्न-धन, सुख और समृद्धि का प्रतीक माना गया है।
इस बार दस दिनों तक चलने वाली आराधना और दो दिन अष्टमी तिथि का संयोग भी इस पर्व की विशेषता बढ़ा रहा है। पडराैना निवासी ज्योतिषाचार्य पंडित हरिओम मिश्र ने बताया कि इस बार भक्तों को नौ के बजाय दस दिन तक मां भगवती की आराधना और व्रत का अवसर मिलेगा। अष्टमी तिथि भी दो दिन रहने के कारण नवरात्रि का यह संयोग विशेष माना जा रहा है।
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विजयपुर दक्षिण पट्टी निवासी पंडित मदन मोहन मिश्र ने बताया कि नवरात्र में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों के साथ महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती की आराधना की जाती है। 19 अक्तूबर को श्री दुर्गाष्टमी, 20 अक्तूबर को महानवमी और इसी दिन विजयादशमी का पर्व मनाया जाएगा। खैरटियां निवासी ज्योतिषाचार्य पंडित विष्णुप्रभाकर पांडेय ने बताया कि ज्योतिष शास्त्र के अनुसार द्विस्वभाव लग्न में घटस्थापना करना शुभ माना गया है। घटस्थापना के लिए कन्या लग्न में सूर्योदय से सुबह 6:51 बजे तक जबकि वृश्चिक स्थिर लग्न में सुबह 9:15 से 11:30 बजे तक शुभ समय बताया गया है। अभिजीत मुहूर्त सुबह 11:43 से दोपहर 12:38 बजे तक रहेगा। इस दौरान घटस्थापना करना विशेष शुभ माना गया है।
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आचार्य अंजनेय मिश्र ने बताया कि नवरात्रि में जौ बोने की भी परंपरा है। जौ को ब्रह्म स्वरूप और पृथ्वी की पहली फसल माना गया है। घटस्थापना में कलश को सुख-समृद्धि, वैभव और मंगलकामना का प्रतीक माना जाता है। पूजा के लिए कलश, गंगाजल, रोली, मौली, सुपारी, लौंग-इलायची, पान, दूर्वा, सिक्के, पंचरत्न, आम या अशोक के पत्ते, नारियल, लाल कपड़ा, फूल-माला, फल, पंचमेवा और अखंड ज्योति सहित अन्य सामग्री की आवश्यकता होगी। घटस्थापना के साथ घी का दीपक जलाकर उसका भी विधि-विधान से पूजन किया जाता है।



कलश स्थापना की सामग्री

- मिट्टी, तांबे या पीतल का कलश
- गंगाजल और शुद्ध जल
- मौली (कलावा), रोली, चंदन, हल्दी
- आम या अशोक के 5 पत्ते
- सुपारी, सिक्का, लौंग, इलायची, और हल्दी की गांठ
- नारियल (लाल चुनरी या लाल कपड़े में लिपटा हुआ)
- जौ या ज्वार बोने के लिए मिट्टी का पात्र और सप्तधान्य/अनाज
- लकड़ी की चौकी और लाल वस्त्र
- मां दुर्गा की प्रतिमा या तस्वीर, और गणेश जी की मूर्ति


कलश स्थापना की विधि

- सूर्योदय से पहले स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनें। पूजा स्थल को अच्छी तरह साफ करके गंगाजल छिड़ककर शुद्ध करें।
- एक मिट्टी के चौड़े बर्तन में शुद्ध मिट्टी डालकर उसमें जौ (ज्वार) के बीज बोएं। इस पर हल्का सा पानी छिड़क दें।
- एक लकड़ी की चौकी पर लाल रंग का साफ कपड़ा बिछाएं। उस पर मां दुर्गा की प्रतिमा और गणेश जी को स्थापित करें।
- माता के दाहिने हाथ की तरफ जमीन या चौकी पर थोड़े चावल (अक्षत) से अष्टदल कमल या स्वास्तिक बनाएं।

ऐसे करें कलश तैयार

- कलश के चारों तरफ मौली (कलावा) बांधें।- कलश में थोड़ा गंगाजल डालकर उसे ऊपर कंठ तक शुद्ध जल से भर दें।
- जल में सुपारी, सिक्का, लौंग, इलायची और हल्दी की गांठ या एक चुटकी हल्दी डालें।

- कलश के मुख पर आम या अशोक के 5 पत्ते लगाएं।
- पत्तों के ऊपर ढक्कन (पूर्ण पात्र) रखें और उसमें चावल भर दें।
- एक नारियल पर कलावा बांधकर उस पर लाल चुनरी या कपड़ा लपेटें। इस नारियल को कलश के ऊपर इस प्रकार रखें।

नौ दिन की पूजा और नियम

- रोज सुबह और शाम को स्नान करके माता की आरती करें, धूप-दीप जलाएं और भोग (फल, मिठाई, बताशा या हलवा) अर्पित करें।
- कलश के पास बोए गए जौ (जवारे) पर हर रोज हल्का-हल्का पानी छिड़कते रहें।
- नौ दिनों तक ''दुर्गासप्तशती'' का पाठ या ''ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चे'' मंत्र का जाप करें।
- इन नौ दिनों में घर में सात्विक भोजन, शुद्धता और ब्रह्मचर्य का पालन करें।
- नवमी या दशमी तिथि को विधि-विधान से पूजा संपन्न करने के बाद कलश को हटाएं और जवारे का विसर्जन या प्रसाद रूप में वितरण करें।
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