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Kushinagar News: भारतीय इतिहास को समझने के लिए सांस्कृतिक निरंतरता को आधार बनाना आवश्यक

Sun, 22 Feb 2026 02:39 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, कुशीनगर
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दुदही। भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद के संयुक्त तत्वावधान में शनिवार को गौरीश्रीराम के एक स्कूल सभागार में “इतिहास में स्व की अवधारणा” विषयक दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ हुआ। शुभारंभ दीप प्रज्वलन एवं सरस्वती वंदना से हुआ। आयोजकों ने न्यास की वैचारिक परंपरा, समाज और संस्कृति के प्रति उसकी प्रतिबद्धता तथा इतिहास के स्वदेशी दृष्टिकोण को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य पर प्रकाश डाला।
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संगोष्ठी के विषय प्रवर्तन में प्रो. शिव कुमार मिश्रा ने ‘स्व’ की दार्शनिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में ‘स्व’ केवल व्यक्तिगत चेतना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समष्टिगत सांस्कृतिक अनुभवों का समन्वित स्वरूप है।
मुख्य वक्ता प्रो. रजनीश शुक्ल ने इतिहास लेखन में औपनिवेशिक दृष्टिकोण की सीमाओं की आलोचना करते हुए कहा कि भारतीय अनुभव-परंपरा स्वयं में एक सशक्त ऐतिहासिक स्रोत है। उन्होंने कहा कि ‘स्व’ प्रतिरोध, पहचान, स्वाभिमान और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का आधार है। भारतीय इतिहास को सही रूप में समझने के लिए अपने जीवन-विश्व, लोक-स्मृति और सांस्कृतिक निरंतरता को आधार बनाना आवश्यक है। उनके वक्तव्य ने शोधार्थियों के बीच नए विमर्श की दिशा प्रशस्त की। मुख्य अतिथि प्रो. सत प्रकाश बंसल ने कहा कि भारतीय इतिहास में ‘स्व’ की खोज न केवल शोध की दृष्टि से आवश्यक है, बल्कि राष्ट्रीय आत्मविश्वास और भविष्य निर्माण के लिए भी महत्वपूर्ण है। विशिष्ट अतिथि संजय भाईसाहब ने संस्कृति और समाज के बीच ‘स्व’ की भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा कि अपनी जड़ों से जुड़े बिना किसी राष्ट्र का समग्र विकास संभव नहीं है। सत्र की अध्यक्षता कर रहे माध्यमिक शिक्षा चयन आयोग के पूर्व अध्यक्ष ईश्वर शरण विश्वकर्मा ने कहा कि ‘स्व’ की अवधारणा भारतीय इतिहास को पुनर्परिभाषित करने की केंद्रीय आधारशिला है। उन्होंने विषय पर गहन शोध की आवश्यकता जताई।
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कार्यक्रम का संचालन डॉ. अस्मित शर्मा ने किया। समापन अवसर पर डॉ. पंकज सिंह ने सभी अतिथियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि संगोष्ठी में प्रस्तुत विचार भविष्य के शोध और विमर्श को नई दिशा देंगे। इस अवसर पर अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के संगठन सचिव डॉ. बालमुकुंद पाण्डेय, संगोष्ठी संयोजक डॉ. शत्रुजीत सिंह, दिल्ली विश्वविद्यालय के डॉ. शचिंद्र मोहन, प्रो. ए.के. दुबे, प्रो. एस.एन. चौबे, गंगेश्वर पाण्डेय सहित अनेक विद्वान उपस्थित रहे।
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