फाजिलनगर। पश्चिमी सभ्यता के अंधानुकरण ने हमारे सामाजिक और मानवीय मूल्यों को पतन की राह पर पहुंचा दिया है। अपनी भाषा, साहित्य और संस्कृति से दूरी ने गंभीर संकट पैदा कर दिया है। इनके संरक्षण के लिए सरकार को विशेष प्रयास करने होंगे। ये बातें गोरखपुर यूनिवर्सिटी के प्रो. मुरली मनोहर पाठक ने शनिवार को श्री भगवान महावीर महाविद्यालय फाजिलनगर में यूजीसी की तरफ से आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन अवसर पर बतौर मुख्य अतिथि कहीं।
मानव मूल्यों की परिकल्पना...वर्तमान संदर्भ में विषयक इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में प्रो. पाठक ने कहा कि हर देश व समाज की अपनी विशिष्ट सभ्यता, संस्कृति व भाषा होती है, जो वहां के परिवेश से बहुत हद तक प्रभावित होती है। हमारे सामाजिक व मानवीय मूल्यों की विस्तृत चर्चा संस्कृत में लिखे प्राचीन ग्रंथों में हैं। लेकिन पश्चिमी सभ्यता के अंधानुकरण के साथ अंग्रेजी भाषा के बढ़ते प्रभाव ने इन ग्रंथों में लिखी बातों को भी विस्मृत कर दिया है। आज जरूरत है कि संस्कृत के इन ग्रंथों में प्रतिपादित मानव मूल्यों का प्रचार प्रसार कराया जाए। इसके अलावा भारतीय भाषाओं के उत्थान के लिए अतिरिक्त प्रयास किए जाएं। लखनऊ यूनिवर्सिटी से प्रोफेसर विजय कर्ण ने कहा कि संस्कृत भाषा सबसे प्राचीन है। प्राचीनता से विमुख होकर आधुनिकता की तरफ जाने की प्रवृति ने इस भाषा के साथ-साथ सामाजिक मूल्यों को भी पीछे कर दिया है। काशी हिंदू विश्वविद्यालय वाराणसी की प्रोफेसर विमला कर्नाटका ने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि मानवीय मूल्यों में कमी के लिए प्रमुख रूप से अंधानुकरण की यही प्रवृत्ति जिम्मेदार है। प्राचार्य डा. ओंकारनाथ मिश्र ने अतिथियों का स्वागत एवं आभार प्रकट किया। संचालन संगोष्ठी के संयोजक डा. केसी चौरसिया ने किया। इस अवसर पर डा. मुन्ना तिवारी, डा. ज्योत्स्ना पांडेय, डा. ब्रह्मदेव सिंह, डा. शमीम राइन, डा. लक्ष्मी मिश्रा समेत तमाम शिक्षक व अन्य लोग मौजूद थे।