-अज्ञात तस्करों पर वन विभाग ने दर्ज किया केस, सोहगीबरवा जंगल से खैर की लकड़ी काटकर लाने की आशंका
-रस्सी में बांधकर नदी के अंदर छिपाई गई थी लकड़ी, वन विभाग के सिपाहियों ने मशक्कत के बाद निकाला
संवाद न्यूज एजेंसी
खड्डा (कुशीनगर)। नदी में छिपाई गई खैर की 46 बोटा लकड़ी (लाल सोना) वन विभाग की टीम ने बृहस्पतिवार को बरामद की। इसकी कीमत 50 लाख से अधिक बताई जा रही है। आशंका जताई जा रही है कि महराजगंज के सोहगीबरवा जंगल से खैर की लकड़ी काटकर पुलिस से बचने के लिए तस्करों ने नदी में छिपाई थी। वन विभाग ने अज्ञात तस्करों पर केस दर्ज कर उनकी पहचान करने में जुट गई है।
खैर की लकड़ी की तस्करी का कभी कुशीनगर और महराजगंज से सटा बाॅर्डर हब हुआ करता था। प्रशासन की सख्ती के बाद तस्करों ने खैर की तस्करी से मुंहमोड़ लिया था। वन विभाग के खड्डा रेंजर अमृता चंद को सूचना मिली कि सोहगीबरवा जंगल से खैर की लकड़ी काटकर खड्डा क्षेत्र में लाई जा रही है। वन विभाग की टीम सक्रिय हुई और निगरानी बढ़ा दी। तस्करों को इसकी भनक लग गई तो उन्होंने गंडक नदी में रस्सी से बांधकर लकड़ी छिपा दी। बृहस्पतिवार को वन विभाग की टीम ने गंडक नदी में तलाश शुरू की तो पता चला कि खैर की लकड़ी नदी में छुपाई गई है।
वन दरोगा सदानंद, वन रक्षक शत्रुध्न ठाकुर एवं सत्येंद्र कुमार के नेतृत्व में सचल दल के जवानों ने नाव से नदी में घूमकर पूरे दिन खैर की लकड़ी बरामद की। लकड़ी को वन विभाग के रेंजर कार्यालय लाया गया। वन विभाग के अनुसार यह लकड़ी महराजगंज के सोहगीबरवा वन क्षेत्र से काटकर नदी के रास्ते खड्डा लाई जा रही थी। तस्करों की पहचान करने में वन विभाग जुटा है। वर्ष 2023 में खड्डा वन विभाग ने हनुमानगंज गांव के पास से नदी में रखी गई 65 बोटा खैर की लकड़ी बरामद हुई थी।
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नदी के अंदर छुपा कर रखी गई खैर की लकड़ी बरामद हुई है। इसे सोहगीबरवा वन क्षेत्र से काटकर तस्करी करके लाया जा रहा था। अज्ञात तस्करों के खिलाफ केस दर्ज कर लिया गया है। उनकी पहचान के लिए टीम लगाई गई है। प्रथम दृष्टया जांच में पता चला है कि महराजगंज के सोहगीबरवा वन विभाग से खैर काटा गया है।
-अमृता चंद, रेंजर खड्डा
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तस्करी का ऐसे चलता है खेल
बरसात के दिनों में नदी जंगल से सट जाती है या पानी जंगल में प्रवेश कर जाता है। तस्कर लकड़ी काटकर नाव के जरिये या लकड़ियों को रस्से से बांध कर पानी की धारा में बहा देते हैं, और तय स्थान पर पहुंचने के बाद रस्सी में बंधी लकड़ी रोक ली जाती है। बाद में इसे नदी से बाहर निकालकर गोपनीय तरीके से बेच दिया जाता है।
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कभी इस लकड़ी के लिए होती थी गैंगवार
लाल सोना के नाम से खैर की लकड़ी जानी जाती है। अवैध कटान से खैर का जंगल से उजड़ गया है। क्षेत्र में कई गैंग खैर के लकड़ी की तस्करी से जुड़े हैं। इसको लेकर कई बार गैंगवार भी हो चुकी है। कुछ दशक पहले तक महराजगंज के सोहगीबरवा जंगल व बिहार के वाल्मीकि टाइगर रिजर्व के जंगल खैर की लकड़ी से भरे पड़े थे। लोग इसके गुण के बारे में अनजान थे, पूजा पाठ व घरों की चौखट, खंभा लगाने के अलावा इसका कोई इस्तेमाल नहीं था। अचानक पश्चिम से कुछ लोग आए व इसये कत्था बनाने की बात सामने आई। शुरू-शुरू में इस लकड़ी को बेरोक टोक काटकर खड्डा स्टेशन से ट्रेनों की बोगी में लादकर बरेली भेजा जाने लगा। देखते-देखते इसकी कीमत व महत्व का पता चला तो अंधाधुंध पेड़ काटे जाने लगे और ट्रकों से भरकर लकड़ी बिना दस्तावेज कत्था फैक्ट्रियों में भेजी जाने लगी। कुछ समय बाद जंगल पार्टी के डकैत इस धंधे में उतर गए। सफेदपोश व कुछ बदनाम पुलिस वालों की गठजोड़ से लगभग चार दशक तक लाल सोना का काला धंध चलता रहा। जंगल से खैर के वृक्ष लगभग समाप्त हो गए।