मंझनपुर। अधिक पैदावार के चक्कर में बढ़ते रासायनिक खादों के प्रयोग से जिले की मिट्टी की सेहत बिगड़ रहा है। ऑर्गेनिक काॅर्बन, नाइट्रोजन और फास्फोरस न्यूनतम की श्रेणी में पहुंच गया है। वहीं, सल्फर, आयरन, जिंक और मैग्नीशियम में भी कमी आई है। इससे न केवल उर्वराशक्ति कमजोर हो रही है, बल्कि पैदा होने वाला अनाज अथवा सब्जियों की पौष्टिकता में भी कमी आई है।
यह बातें पिछले साल कराई गई मिट्टी की जांच रिपोर्ट से निकल कर आई है। जिले में कुल आठ ब्लॉक हैं। गत वर्ष 2022-23 में हर ब्लॉक से दो-दो गांवों से खेतों की मिट्टी के नमूने लिए गए थे। इस तरह सभी आठ ब्लॉकों के 16 गांवों से कुल 3178 नमूने लिए गए। जिला मुख्यालय की मृदा परीक्षण प्रयोगशाला में इनकी जांच हुई। रिपोर्ट आई तो पता चला कि रासायनिक खादों के प्रयोग से मिट्टी की उर्वराशक्ति कमजोर हाे रही है। इसके बाद कृषि विभाग की ओर से संबंधित गांवों में शिविर लगाए गए। इसे लेकर किसानों को सचेत और जागरूक किया गया।
जैविक, कंपोस्ट और हरी खाद का बढ़ाएं प्रयोग
कृषि विज्ञान केंद्र के मृदा वैज्ञानिक डॉ. मनोज कुमार सिंह कहते हैं कि मिट्टी की उर्वराशक्ति को बरकरार रखने के लिए जैविक, कंपोस्ट और हरी खाद के प्रयोग पर जोर देना होगा। रासायनिक खादों के प्रयोग को सीमित करने और प्राकृतिक खेती को भी बढ़ावा देने की जरूरत है। उर्वराशक्ति घटने की एक वजह फसल चक्र को भूल जाना भी है। इसलिए किसानों को चाहिए कि वह एक ही फसल न लें। बल्कि, धान और गेहूं के बाद दलहनी फसलें जरूर लगाएं।
रासायनिक खादों के नुकसान की जानकारी है, लेकिन करें तो क्या। दिनों दिन घटते पशुपालन से पर्याप्त मात्रा में गोबर की खाद नहीं मिल पाती। मजबूरन खेतों में रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल करना पड़ रहा है।
-नथन सिंह, किसान, डिहवा हसनपुर
रासायनिक खादों के अंधाधुंध इस्तेमाल से पैदावार घट रही है। जितना उत्पादन घटता है, उतनी की खाद बढ़ती जाती है। चाह कर भी गोबर की खाद का प्रयोग नहीं कर पाते। कारण उसकी पर्याप्त उपलब्धता ही नहीं है।
-रामचंद्र यादव, किसान सेंवथा
जिन गांवों की मिट्टी के नमूने की जांच में उर्वरशक्ति घटने की बात सामने आई थी, वहां शिविर लगाकर किसानों को जागरूक किया गया है। इसके अलावा भी लगातार गोष्ठी और अन्य आयोजनों में किसानों को प्राकृतिक खेती, कंपोस्ट और हरी खाद के प्रयोग के लिए प्रेरित किया जा रहा है।
-एसके तिवारी, उपनिदेशक कृषि