चरवा में रामलीला का मंचन करते कलाकार। फाइल फोटो
कस्बे की श्री रामलीला का इतिहास करीब 175 वर्ष पुराना है। इसकी शुरुआत वर्ष 1850 में पंडित शंभूनाथ और पंडित शारदा प्रसाद ने की थी। तब से लेकर आज तक यह रामलीला एक ही स्थान पर हो रही है।
चरवा को इन दिनों नगर पंचायत का दर्जा मिला है लेकिन, ग्राम पंचायत होने के दौरान यहां 28 मजरे थे। मजरे के अलावा यहां आसपास के समसपुर, काजू, हरदुआ, टाटा, बादशाहपुर, चौराडीह जैसे गांवों से भी सैकड़ों की संख्या में लोग यहां रामलीला देखने पहुंचते हैं।
स्थानीय निवासी 90 वर्षीय सेवानिवृत्त अध्यापक राजाराम पांडेय बताते हैं कि चरवा की रामलीला अपने आप में अद्भुत होती है। यहां के कलाकार महीने भर पहले से ही अपने किरदार का अभ्यास करना शुरू कर देते हैं। बीते दशकों में हंसराज पांडेय ने राजा जनक, अशोक तिवारी ने रावण, लवकुश पांडे ने हनुमान और ललित केसरवानी ने मेघनाथ जैसे प्रमुख पात्रों को जीवंत कर दर्शकों का दिल जीता।
सबसे खास बात यह है कि राम-लक्ष्मण से लेकर ज्यादातर पात्र स्थानीय ग्रामीण ही निभाते हैं। कुछ नृत्य कलाकार अब बाहर से भी बुलाए जाते हैं। संवाद
कभी मशाल की रोशनी में होती थी रामलीला
पुराने दिनों में मशालों की रोशनी में हजारों की भीड़ के बीच कलाकार अपनी बुलंद आवाज से मंचन करते थे। धीरे-धीरे समय के साथ रोशनी, ध्वनि और साज-सज्जा में बदलाव आया और राजनीति का असर भी इस मंचन तक पहुंचा। फिर भी चरवा की श्री रामलीला समिति की विशेषता आज भी बरकरार है। यहां नवमी से मेला शुरू होता है और भव्य झांकियां निकाली जाती हैं। यही वजह है कि यह परंपरा न सिर्फ चरवा की, बल्कि पूरे कौशाम्बी की सांस्कृतिक धरोहर बन चुकी है।