विभागीय मेले में अपने उत्पाद के साथ खड़ी शाबा। स्रोत- स्वयं
ग्रामीण क्षेत्र की परंपरागत कला को नया आयाम देने वाली मीरपुर की शाबा अंसारी कुरूसिया क्राफ्ट को पुनर्जीवित करने में लगी हैं। करीब चार साल पहले उन्होंने यह काम शुरू किया था। आज यह कला न केवल उनकी पहचान बन चुकी है, बल्कि उन्हें आत्मनिर्भर भी बना रही है।
शाबा बताती हैं कि कुरूसिया क्राफ्ट मुख्य रूप से त्योहारों और खास अवसरों पर खूब बिकती है। शहरों में लगने वाले मेलों में इनकी खास मांग रहती है। इस कला के जरिये वह हर महीने तीन से पांच हजार रुपये तक की आमदनी कर लेती हैं।
उनके समूह से जुड़ी अन्य महिलाएं भी अपने-अपने स्तर पर अलग-अलग हस्तशिल्प का काम कर रही हैं। बता दें कि शाबा ने ग्रामीण परिवेश की इस परंपरागत कला को आधुनिक रूप देने के साथ-साथ इसके संरक्षण की दिशा में भी सराहनीय प्रयास किया है।
जिला समन्वयक राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन दिव्यांशु सिंह ने बताया कि शाबा के प्रयासों से न केवल महिलाओं को रोजगार का अवसर मिला है, बल्कि पुरानी कला को भी नई पहचान मिल रही है।
इन सामग्रियों को करती हैं निर्माण
शाबा ने बताया कि उनका समूह हाथ से बच्चों के लिए गर्म कपड़े, छोटे मोटे सजावटी सामग्री, मेज पोश, फर्श दरी और पावदान आदि का निर्माण करता है। इनकी बिक्री विभाग की ओर से आयोजित मेले और प्रदर्शनी में ज्यादा होती है। उन्होंने बताया कि प्रदर्शनी को छोड़ दें तो पूरे माह में चार से पांच हजार रुपये से अधिक की बिक्री नहीं होती।