मंझनपुर। गोस्वामी तुलसीदास की पत्नी महेवाघाट में आयोजित नौ दिवसीय रामकथा के छठवें दिन गुरुवार को संत मोरारी बापू ने कहा कि नारी सदैव श्रेष्ठ होती है। रत्नावली को स्त्री तथा तुलसी को पुरुष प्रेम में नहीं बांधना चाहिए। पुरुष में जो शक्ति होती है वह स्त्रीवाचक है। पुरुष की भक्ति, शक्ति, विद्या, क्षमा, करुणा, वीरता, धीरता आदि सब स्त्रीवाचक है। कथा का यहां होना अपने आप में सिद्ध करता है कि रत्नावली विशेष हैं। क्योंकि विशेष में अपना एक आकर्षण होता है। विशेष ही विशेष को खींचता है। जिसमें विशेष प्रकार की बातें होती हैं वो चारों और से आकर्षित करती है। मां रत्नावली इसी प्रकार का एक व्यक्तित्व हैं।
बापू ने व्यासपीठ से जनकपुर नगर दर्शन तथा पुष्प वाटिका प्रसंग सुनाया। कहा कि साधु सबसे ऊंचा है और साधुता बहुत कठिन है। गुरू को कभी त्यागना नहीं चाहिए। यह रामकथा महान साधु रत्नावली की कथा है। साधु नाम भी नहीं है और न ही विशेषण है। बल्कि, वह एक स्वभाव है।
भगवान से यदि कुछ मांगो तो साधु संत मांगो। श्रेष्ठ व अश्रेष्ठ करने का निर्णय करने वाले हम कौन होते हैं। कौन छोटा है ओर कौन बड़ा, यह कहना एक अपराध समान है। यह द्वन्द्व यदि जगत से निकल जाए तो उसी क्षण साधुता प्रकट हो जाएगी। संदेह के बड़ा होने पर आदमी शांति से नहीं रह पाता है। श्रेष्ठ और निम्न की चर्चा में मातृ शरीर श्रेष्ठ है। श्रेष्ठ वो है जो श्रेष्ठ नहीं है उसे भी अपने से ज्यादा श्रेष्ठ बना दे। रत्नावली ने यह काम किया है। रत्नावली के नकार ने तुलसीदास को राम नाम के रकार तक पहुंचा दिया। स्त्री के लिए सच्चा शृंगार उसका पति ही है। पति के बिना सब शृंगार सारहीन है। अच्छी नारी के लिए पति कैसा भी हो लेकिन वो देव समान होता है। दुर्गुणि, गुणहीन होने पर भी सती सावित्री उसे नहीं छोड़ती है। पुत्र कैसा भी हो माता उसे त्यागती नहीं है। संसार में कोई तन पति है तो कोई मन पति। कोई बुद्धि पति होते हैं तो कोई चित्त पति होते हैं। कथा में मुख्य आयोजनकर्ता मदन पालीवाल, रविन्द्र जोशी, रूपेश व्यास, विकास पुरोहित, मंत्रराज पालीवाल, प्रकाश पुरोहित सहित तमाम लोगों ने व्यासपीठ पर पुष्प अर्पित किया।
गुरू वन्दन की महिमा बताते हुए बापू ने कहा कि गुरू नाम की महिमा भी एक प्रकार का मंत्र एवं जाप है। गुरू कृपा से जितना और जैसा समझ आए उतना और वैसे ही समझना चाहिए। गुरू मूर्ति की नित्य पूजा करनी चाहिए। गुरू का नाम मंत्र है, साधन है और गुरू की स्मृति साधना हैं। गुरू नाम की भिक्षा अपनी आत्मा से ही लेनी चाहिए। बहुत ही सूक्ष्मतम दृष्टि से गुरू ज्ञान पाया जा सकता है। सूक्ष्म साधना से यदि हम आज भी ढूंढेगे तो हमें नानक देव, बुद्ध, तुलसीदास, रत्नावली आदि महसूस किए जा सकते हैं। गुरू वचन का कोई विकल्प नही है।