चारपाई पर बैठकर पीली साड़ी फूलकली और उनके बगल में देवरानी राजरानी बनाती दोना। स्रोत: ग्रामीण
आधुनिकता की दौड़ में जहां पत्तल-दोना बनाने जैसी पारंपरिक आजीविकाएं धीरे-धीरे खत्म होती जा रही हैं, वहीं सिराथू नगर पंचायत के वार्ड नंबर-7 की रहने वाली 75 वर्षीय फूलकली पत्तों के दोना और पत्तल बनाकर परंपरा संवार रहीं हैं।
मुसहर समाज से आने वाली फूलकली ने बताया कि करीब तीन वर्ष पहले पति ज्ञानचंद्र की मौत हो गई। तब से घर में सिर्फ वह और उनकी 20 वर्षीय बेटी विजयलक्ष्मी ही रह गईं। तमाम कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने बेटी की पढ़ाई नहीं रुकने दी। विजयलक्ष्मी इस समय बीए की पढ़ाई कर रही हैं।
फूलकली कहती हैं कि वह रोज सुबह चार बजे उठ जाती हैं। घर से करीब दो किलोमीटर दूर रेलवे पटरी के किनारे लगे छिउल के पेड़ों से पत्ते तोड़कर लाती हैं। इसके बाद घर लौटकर दोना-पत्तल बनाने का काम शुरू हो जाता है। वह दोना-पत्तल क्षेत्र की नाश्ते और चाय की दुकानों पर बेचती हैं। इसी कमाई से घर का खर्च चलता है।
अब लोग सिर्फ पारंपरिक रस्मों के लिए ही लेते हैं पत्तल
फूलकली बताती हैं कि उनके समाज में बचपन से ही दोना-पत्तल बनाने का काम होता आया है। एक समय था जब शादी-विवाह और बड़े आयोजनों में सैकड़ों पत्तल और दोने बिकते थे। पूरा परिवार दिन-रात इस काम में लगा रहता था। लेकिन अब ऐसा नहीं है।
बिना आवास के झोपड़ी में गुजर रहा जीवन
फूलकली बताती हैं कि आज तक उन्हें सरकारी आवास तक नहीं मिला। तिरपाल डालकर झोपड़ी में जीवन गुजर रहा है। उनकी मदद के लिए देवरानी राजरानी भी दोना-पत्तल बनाने में हाथ बंटाती हैं।