कोरोना की तीसरी लहर दोआबा के बच्चों को महामारी की जद में धकेल सकती है। जिले में केवल एक बाल रोग विशेषज्ञ और जिला अस्पताल में केवल बच्चों के लिए इलाज के लिए 10 बेड की व्यवस्था की गई है।
जिला अस्पताल के एसएनसीयू वार्ड में अभी से ही क्षमता से दोगुने बच्चे भर्ती हैं। एक बेड पर दो-दो बच्चों को लिटाया गया है। ऐसी हालत में अगर बच्चों में कोरोना का प्रकोप बढ़ा तो हालात बेकाबू हो सकते हैं।
अस्पताल प्रशासन के पास न तो बच्चों को भर्ती करने के लिए पर्याप्त संसाधन हैं और न ही चिकित्सक।
कोरोना की तीसरी लहर में सबसे ज्यादा खतरा बच्चों को बताया गया है। महामारी का यह चरण बच्चों पर ज्यादा असर डालेगा। ऐसी हालत में जिला अस्पताल बच्चों को मुकम्मल इलाज देने में हांफ उठेगा।
अस्पताल के एसएनसीयू वार्ड में दस बेड की व्यवस्था है। यहां शुक्रवार को 20 बच्चे भर्ती थे। एक बेड पर दो-दो बच्चों को लिटाया गया था। कामोवेश यहीं हालत रोज के रहती है। इमरजेंसी के लिए एक बेड की व्यवस्था की गई है।
इसके अलावा अस्पताल प्रशासन के पास पर्याप्त बाल रोग विशेषज्ञ भी नहीं है। सुबह से लेकर दोपहर दो बजे तक (ओपीडी के वक्त) तो चिकित्सक रहते हैं। बाद में यहां की व्यवस्था सिर्फ स्टाफ नर्सों के भरोसे रहती है।
प्रयागराज के चिल्ड्रन अस्पताल रेफर किए जाते हैं बच्चे
जिला अस्पताल के एसएनसीयू वार्ड में बच्चों की संख्या बढ़ने पर स्टाफ बच्चों को प्रयागराज के चिल्ड्रन अस्पताल रेफर कर देता है। इसकी वजह से आए दिन स्टाफ व तीमारदारों के बीच विवाद होता रहता है। अस्पताल का स्टाफ खुद को असुरक्षित मान रहा है।
एक चिकित्सक के भरोसे हैं वार्ड
जिला अस्पताल का एसएनसीयू वार्ड सिर्फ एक चिकित्सक के भरोसे हैं। बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. निखिल धवन सप्ताह में तीन दिन ही आते हैं। इसके अलावा जिला अस्पताल की ओपीडी में बैठने वाले चिकित्सक डॉ. विश्व प्रकाश व डॉ. आरके निर्मल को किसी तरह की इमरजेंसी पड़ने पर एसएनसीयू में भर्ती बच्चों को देखने के लिए भेजा जाता है।
यह चिकित्सक सिर्फ ओपीडी के टाइम तक ही रहते हैं। दोपहर दो बजे के बाद अगर किसी बच्चे की तबीयत बिगड़ी तो उसे या रेफर किया जाता है या फिर खुद सीएमएस डॉ. दीपक सेठ बच्चों का इलाज करते हैं।