एकांतवास सजा नहीं, कोरोना पर प्रहार का बड़ा हथियार
बिजिया चौराहा। दोआबा की ग्राम पंचायतों में बने 167 क्वारंटीन सेंटरों पर करीब 1639 परदेशियों को रखा गया था। 14 दिन का वक्त बिता चुके लोगों को अब प्रमाण पत्र देकर घर भेजा जा रहा है। बाकी अभी सेंटर पर ही रहेंगे। जो नए आएंगे उन्हें अलग से क्वारंटीन किया जाएगा। जिले के लोग क्वारंटीन में रहने से घबराते हैं। विभिन्न गांवों से आए दिन इस तरह की खबरें आती हैं कि सेंटर पर रखे गए लोग चोरी-छिपे भाग जाते हैं। ‘क्वारंटीन कोरोना पर प्रहार का बड़ा हथियार है’, यह बताने के लिए रविवार को ‘अमर उजाला’ ने उन लोगों से बातचीत की जो एकांतवास का समय बिताकर घर पहुंच चुके हैं। सभी ने अपने-अपने अनुभव साझा किए। ये भी कहा कि एकांतवास सजा नहीं, कोरोना की चेन तोड़ने का एक बेहतर विकल्प है। पेश है एकांतवासियों की कहानी, उन्हीं की जुबानी-
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निरोग रहने को किया योग, तनाव भी घटा
कौशाम्बी के गढ़वा गांव का रवींद्र कुमार पुत्र राधेश्याम 28 मार्च को वाराणसी से आया था। इसके बाद उसे गांव के ही सेंटर पर क्वारंटीन कर दिया गया। रवींद्र कहता है कि गांव में होते हुए अपनों से दूर रह पाना काफी कठिन था। इसके लिए उसने योग का सहारा लिया। प्रतिदिन सुबह-शाम एक-एक घंटे योग करता था। इससे निरोग भी हुआ और तनाव भी काफी कम हुआ। परिजनों का हाल खबर फोन पर हो जाता था। खाली समय लूडो अथवा कैरम खेलकर बिता दिया। अब कम से कम इस बात की संतुष्टि है कि स्वास्थ्य बिल्कुल ठीक है।
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मोबाइल पर रामायण देखकर बिता दिया दिन
नौहाई गांव का धनराज पुत्र गाजी प्रसाद 28 मार्च को दिल्ली के इंदिरापुरम से घर आया था। यहां उसे भी क्वारंटीन कर दिया गया। धनराज बताता है कि शुरू के दो-चार दिन काफी दिक्कत हुई। इसके बाद उसने रामायण का सहारा लिया। यू-ट्यूब पर आधी से ज्यादा रामायण देख डाली। इसे देखने से तमाम चीजें सीखने को मिलीं। साथ ही वक्त भी कट गया। धनराज का कहना है कि एकांतवास में रहने से किसी को भी परहेज नहीं करना चाहिए। क्योंकि कोरोना से जंग का यह सबसे बड़ा हथियार है।
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लॉकडाउन तक रह सकते हैं क्वारंटीन
जोगापुर गांव का कमलेश पुत्र दुर्गापाल भी 28 मार्च को दिल्ली से घर आया था। वह वहां प्राइवेट नौकरी करता था। कमलेश का कहना है कि शुरू के दो-चार दिन तक काफी अजीब लगे। इसके बाद आदत सी पड़ गई। फोन पर अपनों का हाल मिल जाता था। वक्त काटने को धर्म ग्रंथ पढ़ लिया करते थे। अब पता चला कि बाहर का हाल भी क्वारंटीन सेंटर सा ही है। इसलिए जब तक लॉकडाउन रहे तब तक सेंटर पर रह सकता हूं। दूसरों को भी इससे घबराना नहीं चाहिए।
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मनपसंद काम कीजिए, बिल्कुल न घबराइये
हिसामबाद निवासी राहुल मिश्रा पुत्र विमल मिश्रा दिल्ली में कैंटीन चलाता था। 28 मार्च को वह घर आया। इसके बाद क्वारंटीन कर दिया गया। राहुल बताता है कि सेंटर पर वह अपने मनपसंद काम करता था। बाहर निकलना छोड़कर वो सबकुछ करता था, जो आवश्यक है। जैसे योगा, व्यायाम, मोबाइल पर पिक्चर देखना आदि। राहुल की मानें तो क्वारंटीन सेंटर से भागना कोरोना को दावत देना है। इसलिए 14 दिन एकांतवास में रहकर खुद के साथ अपनों की भी सुरक्षा किया जाना बेहतर है।