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गांधी आश्रमों में धूल से अटे पड़े चरखे

Wed, 01 Oct 2014 05:30 AM IST
Kasganj
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कासगंज। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का गांधी आश्रम का सपना एवं स्वदेशी का नारा तार-तार होता नजर आ रहा है। गांधी आश्रम की कई इकाइयां अब तक बंद हो चुकी हैं। आश्रमों में चरखे धूल से अटे पड़े हैं। चरखा चलाकर जीवन यापन करने वाले कई परिवार अब अन्य विकल्प अपनाकर गुजारा कर रहे हैं। वेतन न मिलने के कारण आश्रम के कर्मी भी आर्थिक तंगी झेल रहे हैं।
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नगर में पांच दशक पहले से गांधी आश्रम का संचालन हो रहा है। एक समय था जब आश्रम पर रुई लेकर सूत कातने वाली महिलाओं का जमावड़ा लगा रहता था। सैकड़ों परिवार सूत कातकर अपने परिवार का गुजारा करते थे। समय के बदलाव के साथ यह दौर धीमी चाल से चलते हुए अब समाप्त होने के कगार पर आ गया है। आश्रम के एक कोने में पड़े चरखों पर धूल चढ़ी है। कासगंज इलाके के पटियाली, मोहनपुरा में संचालित आश्रम की यूनिटें बंद हो चुकी हैं। यहां का गांधी आश्रम भी बंदी के कगार पर हैं। पिछले दो वर्षों से न तो गांधी आश्रम में कोई सामान आया है और न ही सूत कातने के लिए रुई।
पहले आश्रम में लगभग 14 कर्मी काम करते थे, लेकिन अब दो कर्मी ही यहां हैं। अप्रैल से अब तक कोई वेतन नहीं मिला है। 2008 से अब तक कर्मियों व आश्रम का बकाया चल रहा है। दो लाख से अधिक का विद्युत बिल गांधी आश्रम पर बकाया है। इसका भुगतान न होने पर विभाग ने बिजली काट दी है। गांधी आश्रम का भवन भी जर्जर हाल है। गांधीवादी आंदोलन से जोड़कर अपना जीवकोपार्जन करने वाले कर्मी सोचने को मजबूर हैं। उनके सामने परिवार के पालन-पोषण की समस्या है।
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नहीं सुनाई देती ‘रघुपति राघव राजा राम’ की धुन
कासगंज। स्वतंत्रता के समय में गांधी के अनुयायी ‘रघुपति राघव राजा राम’ का गायन करते हुए प्रभात फेरी निकालते थे। स्वतंत्रता के दौर में इन प्रभात फेरियों का क्रेज था। खादी के धोती-कुर्ता व टोपी लगाकर लोग शान से गांधी आंदोलन को गति देते नजर आते थे। अब न प्रभात फेरी नजर आती है और न गांधीवाद की छवि कहीं दिखाई देती है।

अब न माल है और न ही ग्राहक
कासगंज। गांधी आश्रम के इंचार्ज गिरजा शंकर का कहना है कि वह 1988 से गांधी आश्रम में काम कर रहे है। उस समय गांधी आश्रम में माल होता था और ग्राहकों की संख्या अच्छी थी। अब न तो गांधी आश्रम में माल है और न ही ग्राहक। आश्रम पर कच्चे माल का अभाव है। बुनकर परिवार काम न मिलने पर आजीविका के अन्य विकल्प अपना चुके हैं।
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